Friday, July 31, 2020

एक बैंक ऐसा भी: अंतर्राष्ट्रीय श्री सीताराम नाम बैंक, अयोध्या

'हिंदुइस्म टूड़े' (हवाई,अमेरिका) में प्रकाशित लेख। इसका हिन्दी संस्कारण इस ब्लॉग पर पढ़ें  


अंतर्राष्ट्रीय श्री सीताराम नाम बैंक के संस्थापक श्री नृत्यगोपाल दस जी महाराज 
श्री मनीराम आखाडा का मुख्य परिसर 

अंतर्राष्ट्रीय श्री सीताराम नाम बैंक के प्रवेश द्वार पर बैंक के मैनेजर श्री पुनीत राम दास जी 

सीताराम लेखन जप पुस्तिका 



क्या आपने किसी ऐसे बैंक के बारे में सुना या देखा है जो खाता-धारकों से केवल जमा लेता हो और उन्हें कोई भुगतान नहीं करता हो? और आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इस बैंक के 35,000 खाताधारकों को इस व्यवस्था से कोई शिकायत भी नहीं है। इन खाताधारकों को यह विश्वास है उन्हें उनका भुगतान उनके भगवान श्रीराम से मिल जाएगा। जी हाँ, मैं अयोध्या से संचालित अंतर्राष्ट्रीय श्रीसीताराम नाम बैंककी चर्चा कर रहा हूँ। इस अंतर्राष्ट्रीय श्रीसीताराम नाम बैंक की स्थापना सन 1970 के कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन श्री नृत्यगोपालदासजी महाराज ने अयोध्या के श्री मनीराम छावनी ट्रस्ट के वाल्मीकि मंदिर में किया था। तब से यह बैंक लगातार कार्यरत है। आज देश विदेश में इस बैंक की 112 शाखाएं हैं। देश के हर राज्य में इस बैंक की शाखा तो है ही, विदेश में भी यथा इंग्लैंड, अमेरिका, इटली, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, दक्षिण पूर्व एशिया के राष्ट्र, बांग्लादेश, श्री लंका और नेपाल में इस बैंक की शाखाएं आज कार्यरत हैं। पिछले 45 वर्षों में इस बैंक की कुल संपत्ति में इजाफा होता चला आया है और आज इसकी कुल संपत्ति एक खरब तीस अरब से अधिक श्री "सीताराम" नाम की राशि है, जो इस बैंक की थाती है।  


पिछले दिनों सावन माह में अयोध्या में आयोजित मणि-पर्वत मेले के दौरान इस बैंक के बारे में जानने का मौका मिला। इत्तेफाक से बैंक के संस्थापक श्री नृत्यगोपालदासजी भी मणि-पर्वत मेले के सिलसिले में "मनीराम छवनीमें इसी समय आये हुए थे। उन्होंने इस बैंक की स्थापना और उद्देश्यों के बारे में बताया। श्री नृत्यगोपालदासजी ने बताया कि राम-भक्त खाली समय अथवा विश्राम के समय का सदुपयोग राम नाम भजते हुए अथवा उनका सुमिरन कॉपी पर उनका नाम लिखते हुए अक्सर किया करते थे। इस क्रिया को और अधिक उद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में इस बैंक की स्थापना की गयी ताकि राम-भक्त केवल अपने राम का नाम लिखे वरन उसका समुचित हिसाब भी रखें ताकि जीवन की संध्या बेला में संन्यासाश्रम का सही उपयोग हो सके। राम-भक्त श्रद्धालु दुनिया की मोह-माया से ऊपर उठकर प्रभु पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाये इस उद्देश्य की पूर्ति करता है श्री सीताराम बैंक। ऐसे भक्तों का सारा समय अपने राम का नाम लिखने और जपने में बीतता है और वे व्यर्थ की चिंता और मोह से मुक्त होते हैं। दुनिया के छल प्रपंचों से दूर भगवान में मन लगाने का यह एक श्रेष्ठ उपाय है। यह उन्हें आत्मिक संतोष और ख़ुशी देता है।


अंतरराष्ट्रीय श्री सीताराम नाम बैंक का मुख्यालय मनीराम छावनी ट्रस्ट के सामने अवस्थित वालमीकि मंदिर के पहले तल पर है। मेरी जिज्ञासा इस बैंक की कार्यविधि देखने की हुई। अतः मैं श्री नृत्यगोपालदासजी से आज्ञा ले बैंक के कार्यालय में आता हूँ। बैंक में दो कर्मचारी है- एक बैंक प्रबंधक श्री पुनीत रामदासजी महाराज और दूसरा बैंक क्लर्क/ख़ज़ांची श्री केशवदासजी। पुनीत रामदासजी ने मेरी जिज्ञासाओं का समाधान एक-एक कर किया। बैंक की कार्यविधि के बारे में उन्होंने बताया कि खाता खोलने के लिए हर भक्त को सर्वप्रथम पांच लाख श्री सीताराम का नाम बैंक में जमा करवाना पड़ता है। यानि पांच लाख की श्री सीताराम राशि से इस बैंक में कोई भी खाता खुलवा सकता है। हर ऐसे खाताधारी भक्त को एक पासबुक और खाता संख्या आबंटित कर दिया जाता है। इसके बाद हर भक्त एक लाख की श्री सीताराम राशि इस बैंक में जमा करवा सकता है। बैंक एक रजिस्टर में हर खाताधारी का नाम और अन्य व्योरा रखता है। जब यह खाताधारी श्री सीताराम नाम जमा करने आता है तो इसे बैंक के रजिस्टर के साथ-साथ खाताधारी के पासबुक में भी अंकित कर दिया जाता है। बैंक के रिकॉर्ड में आज की तारीख में 35,000 खाताधारी है और बैंक में जमा कुल श्रीसीताराम की पूंजी एक खरब तीस अरब से भी अधिक है। श्री पुनीत रामदासजी ने ही आगे बताया कि भक्त जॉइंट खाता भी खुलवा सकते हैं। खाताधारी डाक द्वारा भी श्रीसीताराम राशि बैंक में जमा कर सकते हैं। डाक से प्राप्त श्री सीताराम राशि की प्राप्ति रसीद भी बैंक निर्गत करता है। हर खाताधारी को बैंक द्वारा एक लेखनजाप पुस्तिका और एक लाल इंक वाली कलम मुफ्त दी जाती है। खाताधारी चाहे तो स्वयं भी किसी भी कॉपी में श्रीसीताराम लिखकर बैंक में जमा कर सकते हैं। पुनीत रामदासजी ने बताया कि लेखनजाप पुस्तिका अक्सर राम-भक्त दान में छपवा कर दे देते हैं। हर भक्त से यह अपेक्षा की जाती है कि वह चौरासी लाख श्रीसीताराम की राशि बैंक में जमा करे। ऐसा जीव की चौरासी लाख योनि के प्रतीकस्वरूप है। लेखन शुरू करने से पहले हर भक्त को एक मन्त्र लिखना होता है जो इस प्रकार है "ओम श्री सीता-लक्षमणय- भरत- शत्रघ्नाय- हनुमत समेत श्री रामचन्द्र परब्रह्मणे नमः" हर भक्त के लिए यह भी आवश्यक है कि श्रीसीताराम का लेखन करते समय वो मन ही मन इसका जाप भी करे।


क्लर्क अथवा खजांची श्री केशवदासजी ने हमें विभिन्न भक्तों द्वारा जमा कराये गए श्री सीताराम की राशि के दर्शन करवाये। इसके लिए हमें एक अन्य कमरे में ले जाया गया जिसे बैंक की भाषा में स्ट्रांग रूम भी कह सकते हैं। यहाँ भक्तों द्वारा जमा किये गए श्रीसीताराम की राशि को लाल कपडे में लपेटकर करीने से रैक पर रखा गया है। प्रतिदिन इसकी पूजा अर्चना भी की जाती है। भक्तों द्वारा विभिन्न भाषा में यह राशि यहां जमा की जाती है। समस्त भारतीय भाषाओँ यथा हिंदी, संस्कृत, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उर्दू, अंग्रेजी के अलावे अंतराष्ट्रीय भाषाओँ में यथा लैटिन, अरबी आदि में जमा किये श्रीसीताराम राशि के दर्शन इस बैंक में किये जा सकते हैं। इसके अलावे भक्त जन अनाज यथा चावल, दाल आदि के दाने पर या फिर किसी भी अन्य माध्यम पर अपने प्रभु श्रीसीताराम के नाम का लेखन करते हैं और इस बैंक में जमा करवाते हैं।
मैं सुबह समय इस बैंक में आया था और यह समय खाताधारकों द्वारा श्रीसीताराम नाम राशि जमा करने का था। सो ये खाताधारक पंक्तिबद्ध खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। खजांची केशवदास जी इनसे श्रीसीताराम राशि जमा लेकर इस राशि को उनके पासबुक और बैंक के रजिस्टर में इन्द्रदराज़ करते जा रहे थे। मेरी इच्छा एक खाताधारी से बात करने की हुई। पंक्ति में खड़े एक भक्त, जिन्होंने अपना नाम ब्रजराज किशोर बताया, से मालूम हुआ कि वे बिहार प्रान्त के नालंदा ज़िला के निवासी हैं और जिला बोर्ड से जिला अभियंता के पद से सेवानिवृत हुए हैं। उन्होंने बताया कि सेवानिवृत होकर अपना समय अपने प्रभु के स्मरण में गुजार रहे हैं। यह भी पता चला कि उनका भरा पूरा परिवार है और गृहस्थ की सारी जिम्मेवारियों से मुक्त होकर अब उन्हें अपने प्रभु की याद में रमे रहना प्रिय लगता है और इसी का एक तरीका है श्रीसीताराम लेखनजाप। मैं उनसे इस जाप लेखन के औचित्य पर प्रश्न करता हूँ। जवाब तुलसीदास की चौपाई में मिलता है: “राम नाम मणिदीप धरु जीह देहरी द्वार; तुलसी भीतर बाहरहूँ जो चाहसि उजियार। यानि तुलसी दास  कहते हैं यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर  उजाला  चाहता है तो मुख-रुपी द्वार की जीव रुपी देहली पर राम नाम रुपी मणि दीपक को रख'।


मुझे बरबस महात्मा गांधी के शब्द याद जाते हैं जो उन्होनें अपनी पत्रिका "हरिजन" (13.10.1946) में लिखा था। उनका मानना था कि श्रीसीताराम का जाप ह्रदय से पूरी श्रद्धा के साथ करनी चाहिए, तभी हमें इसका लाभ मिल सकता है। ब्रजराज किशोर में मुझे राम भक्ति की इसी श्रद्धा के दर्शन हुए। ऐसा महसूस हुआ कि साक्षात भगवान श्रीराम अपने ऐसे ही भक्तों के ह्रदय में विराजे हैं और उनकी रक्षा हर सुख-दुःख में कर रहे हैं। तभी तो ये राम-भक्त इतने उन्मुक्त और सरल ह्रदय हैं। राम-भक्तों की अटूट भक्ति और आस्था को नमन करते हुए मैं बैंक से विदा हुआ।

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