Sunday, March 22, 2026

1. अयोध्या: तीर्थार्थीयों, सैलानियों, एवं तिजारतियों का अद्भुत संगम

स्टेशन से निकलते ही ई-रिक्शा वाले ने हांक लगाईकहाँ जाना है, साहबकिस होटल में बुकिंग हैमैंने घर का पता बताते हुए वहाँ पहुँचाने का किराया जानना चाहा। जो किराया उसने बताया, वो पहले की अपेक्षा तीन गुना था। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मेरा यह पहली बार अयोध्या आना हो रहा था। मैं बढ़े हुए किराए का कारण जानना चाहता था।

बाबूअब हमें राम-पथ से जाने की मनाही है। परिक्रमा मार्ग वाले लंबे रास्ते से जाना पड़ता है’- रिक्शावाले ने स्पष्ट किया। खैर मैं चल पड़ा।

तुमने कैसे समझा कि मैंने होटल में बुकिंग कर रखा है?  - रिक्शा पर बैठते हुए मैंने अगला प्रश्न किया।

सरआप जिस वंदे-मातरम ट्रेन से आए हैं उससे यहाँ सैलानी ही आते हैं और वे यहाँ आने से पहले बहुधा होटल में ऑनलाइन बूकिंग करके ही आते हैं।‘- उसने स्पष्ट किया।

लोग तो अयोध्या तीर्थाटन के उद्देश्य से ही आते हैं। क्या मैं गलत हूँ?- मैंने उसे उलझाने की कोशिश की।

सरतीर्थाटन करने वाले कैसे यात्रा करते हैं उन्हें आप स्टेशन के बाहर पेड़ के छाए में बैठे देख ही चुके हैं। ये लोग लोकल और पैसेंजर ट्रेन में मौसम की धूपबारिश और ठंड सहते हुए प्रभु श्री राम के दर्शन हेतु आते हैं। इन्हें अपनी सुविधाओं का ख्याल नहीं रहता। सुदूर गाँव से ये साल के तीन महत्वपूर्ण अवसर पर अयोध्या नागरी अवश्य पधारते हैं- चैत्र में राम-नवमीसावन में मणि-पर्वत मेला के समय और कार्तिक में। ये ही असली तीर्थार्थी हैं। शेष अन्य शहरों से आनेवाले सैलानी हैं जिन्हें श्रीरामजन्मभूमि मंदिर देखने की उत्कंठा रहती है। वे ऊंचे दाम वाले होटल में ठहरते हैं और एक दो दिन रुक कर दर्शन कर वापस लौट आते हैं।‘- रिक्शा वाले ने स्पष्ट किया।

और कौन आते हैं अयोध्या नागरी में?’—मैंने उसे कूदेरते हुए पूछा।

‘इन दिनों एक तीसरा वर्ग का रुख भी अयोध्या की ओर हुआ है। ये तिजारतियों का वर्ग है। इनके लिए अयोध्या व्यापार बढ़ाने का जरिया है। ये अयोध्या में भूमि खरीद रहे हैं। इनसे लोकोपकार की अपेक्षा करने का कोई मतलब नहीं है। पहले के जमाने के अमीर साहूकार और जमींदार वर्ग अयोध्या में कितने ही धर्मशाला स्थापित किए ताकि यहाँ आने वाले श्रद्ध।लुओं को किसी प्रकार की किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े। पूर्व का यह वर्ग खानदानी साधन-सम्पन्न था जो अपने हिस्से की कमाई का एक हिस्सा धर्म के कार्यों में लगाते थे- आश्रमों को दान देनाधर्मशाला स्थापित करनाकुएं खुदवानाबावड़ी खुदवाना आदि आदि। किन्तु आज का साधन-सम्पन्न वर्ग तिजारती हो गया है और उनका मकसद अयोध्या में ज़मीन खरीद कर इसके मूल्यों में बढ़ोतरी का इंतज़ार करना मात्र है। ये अयोध्या में अपने व्यापार के विस्तार के लिए आते हैं।’- रिक्शा वाले ने स्पष्ट किया । इत्तेफाकन आज के समाचार पत्र में एक समाचार पर नज़र चली गयी जो उस रिक्शा वाले की बातों का मर्म बताती प्रतीत हुई।    

बात कुछ आगे बढ़ती तब तक मेरा गंतव्य आ गया था। मैंने किराया चुकाया और घर में आ गया। 









Friday, January 6, 2023

पारसनाथ- निर्वाण भूमि श्री सम्मेद शिखरजी सिद्ध क्षेत्र

 

पारसनाथ सम्मेद शिखरजी के दुर्गम रास्ते पर जलावन के लिए तेहणीयन लेकर जाती आदिवासी महिलाएं 


पारसनाथ की पहाड़ियाँ 

सीता-नाला में जड़ी-बूटियाँ बेचती आदिवासी महिला 


शिखरीजी की ओर जाता पथ

पारसनाथ का एक विहंगम दृश्य 





कालिकुंड में जैन मंदिर 


जल मंदिर 


पार्श्वनाथ की चोटी से मधुबन का विहंगम दृश्य 

जैन श्रद्धालु को पार्श्वनाथ के दर्शन कराने ले जाते आदिवासी युवक 

                                            मरंग बुरु का पुजा स्थल- यह संथाल आदिवासियों का देवता हैं 




सम्मेद शिखर्जी पर भगवान पार्श्वनाथ का समाधिस्थल  

पारसनाथ- निर्वाण भूमि श्री सम्मेद शिखरजी सिद्ध क्षेत्र

राजेश सहाय

('स्कोलास्टिक वर्ल्ड', जमशेदपुर एवं 'लाक्षा', रांची पत्रिका में प्रकाशित) 

नई-दिल्ली कोलकाता रेल-खण्ड पर ट्रेन गया से ज्यों ही खुलती है, लगता है आप एक दूसरी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। गंगा के मैदानी इलाके का यहाँ अंत हो जाता है और झारखंड अपनी समस्त प्राकृतिक तोहफों के साथ पर्यटकों को मानो आमंत्रित करता प्रतीत होता है। सदा हरे-भरे रहने वाले घने जंगल और ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ और उनसे कल कल बहता झरने का निर्झर जल एक असीम सुकून और शांति का एहसास देता है। मासूम, गरीब आदिवासियों से आबाद यह राज्य अपनी प्राकृतिक मासूमियत के अंदर असीम खनिज संपदा छिपाये है। इन दोनों का ही यहाँ वर्षों से शोषण और दोहन होता आया है- पहले दिखुओं द्वारा और सन 2000 में झारखंड बनने के बाद अपने ही भाई बन्धुओं द्वारा। इन्हीं प्राकृतिक वादियों का आनद लेता मैं अपने गंतव्य पारसनाथ कब पहुंच गया पता भी नहीं चला।

गया से करीब 170 किलोमीटर और धनबाद से 60 किलोमीटर पर रेलवे के ग्रांड कॉर्ड पर अवस्थित पारसनाथ जैन धर्मावलंबियों का एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। पारसनाथ रेलवे स्टेशन वस्तूत: ईसरी बाज़ार में है और यहाँ से सम्मेद शिखरजी जहाँ 20 जैन तीर्थंकर समाधिस्थ है करीब 23 किलोमीटर है। ईसरी बेज़ार से मधुबन तक की सीधी दूरी हालाकि 10 किलोमीटर से अधिक की नहीं है परंतु घने जंगलों और पहाड़ियों के वजह से घूम कर रास्ता निकाला गया है जिसकी वजह से यह दूरी तकरीबन 23 किलोमीटर हो जाती है। दूर से ही पार्श्वनाथ टोंक तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता नज़र आता है। चंद यात्रियों के साथ पारसनाथ रेलवे स्टेशन से बाहर आता हूँ। कतिपय यात्री ही मधुबन जाने वाले हैं। शेष यहीं ईसरी बेज़ार में अपने काम से रुक गये हैं। एक टैक्सी वाले से बात करता हूँ। पता चलता है कि पारसनाथ की पहाड़ियों पर जैन तीर्थंकर की समाधि के दर्शन के लिये श्रद्धालुगण प्रातः 3-4 बजे ही निकल पड़ते हैं। इस हिसाब से मैं करीब 3-4 घंटे विलंब से पारसनाथ पहुंचा हूँ। तथापि हिम्मत ना हारते हुए मैं आज ही पहाड़ी पर चढ़ने का निश्चय कर एक टैक्सी में अन्य यात्रियों के साथ मधुबन की ओर निकल पड़ता हूँ। करीब 7 बजे मैं मधुबन में पारसनाथ पहाड़ी की आधार बिन्दु पर खड़ा हूँ। टैक्सी के सह-यात्री छंट गये हैं। दो ही अन्य यात्री को मैं अपनी श्रेणी में पाता हूँ जो मेरी तरह आज ही पहाड़ी चढ़ने को तैयार हैं। ये दोनो ही बंगाल से आये हुए हैं। एक शिला पर यात्रियों को हिम्मत बंधाता एक कवि की चंद पंक्तियाँ उकेरी गयी है और साथ भी यह सूचना भी कि शिखर तक की दूरी करीब 14 किलो मीटर की है। शिखरजी पर्वत चोटी 1350 मीटर ( 4,430 फीट) है। पर्वत की तलहटी, जिसे मधुबन कहते हैं, में कईं धर्मशालायें और होटल खुल गये हैं जहाँ पर्यटक रात्रि विश्राम कर सकते हैं। यहाँ वे सभी सुविधायें उपलब्ध हैं जो किसी भी छोटे शहर मे अपेक्षा की जा सकती है।खैर आपस में बात-चीत करते हुए हम पहाड़ी चढ़ना शुरू करते हैं। दूर एक पर्वत शिखर पर अलग-थलग एक मंदिर नज़र आता है। मालूम नहीं यह कौन सा मंदिर है। अन्य मंदिरों से यह मंदिर अलग है। और सभी मंदिर एक झुण्ड में अन्य तीन या चार पर्वत शिखर पर पास-पास अवस्थित दिखते हैं। सह-यात्री से पता चलता है कि यह अलग अवस्थित मंदिर ही पार्श्वनाथ का टोंक है। मैं यकीन नहीं कर पाता क्योंकि यह काफी ऊँचाई पर अवस्थित है- अन्य मंदिरों से भी काफी ऊंचे पर। खैर सह-यात्रियों से बात चीत करते हुए मैं धार्मिक पर्वत यात्रा शुरू करता हूँ। घने जंगलों के बीच अब पार्श्वनाथ का टोंक छिप गया है और कभी-कभी ही नज़र आता है। लगता है बस कुछ ही दूरी पर है।

इन्ही टेढ़े मेढ़े रास्ते पर चलते हुए एक घंटे में हम कालिकुंड पहुँचते हैं। कालिकुंड से थोड़ा पहले आदिवासियों का माझीथान है जहाँ मारंग बुरू दिशुम के पूजा आदिवासी जन करते हैं। कालिकुंड में 24 तीर्थंकारों की स्मृति में मंदिर बने हुए हैं। जो यात्री आगे  की यात्रा करने में अपने को असक्षम पाते हैं वे यहाँ से दर्शन कर वापस जा सकते हैं। मेरे साथ के दोनो बंगाली महानुभाव इतने अधिक थक गये हैं कि वे यहाँ लम्बा विश्राम का निर्णय कर रुक जाते हैं। मैं बोतल से पानी निकाल कर पीता हूँ और एक साधु की दी हुई लाठी लेकर आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ। "बेटा आगे बंदर बहुत हैं और बिना लाठी लिये चलना श्रेयष्कर नहीं है"- साधु की इस हिदायत पर मैं उन्हें धन्यवाद दे, उनसे लाठी ले आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ- अकेले ही शेष 11 किलो मीटर की यात्रा पर। ऐसे भी यहाँ मान्यता है कि पहाड़ की तलहटी पर मधुबन में अवस्थित भूमियाजी मंदिर में सर नवा कर जो तीर्थ यात्री इस यात्रा पर निकलता है वो कभी नहीं भटकता और यदि गाहे बगाहे भटक भी गया तो रास्ते में कहीं से कुत्ते प्रकट होते हैं जो यात्री को सही राह दिखा गायब हो जाते हैं। भूमियाजी पर इसी परम विश्वास के साथ में आगे की यात्रा पर चल पड़ा हूँ। यूं भी बीच-बीच में पड़ने वाले छिटपुट गाव और इनमें बसने वाले आदिवासी आपको अकेलेपन का अहसास नहीं होने देंगें। जरूरत पड़ने पर झरने का शीतल जल जो किसी भी मिनरल वॉटर को मात कर दे, जाने कहाँ से लाकर आपकी प्यास मिटा दे, आप कह नहीं सकते। प्रकृति और प्रकृति के बीच बसे इन आदिवासियों के सानिध्य में मैं कब अगले दो घंटे चल गया पता भी नहीं चला और सीता नाला आ गया जो कि कुल यात्रा के आधे रास्ते पड़ता है। यहाँ से दो मार्ग हो जाते हैं। यहाँ पर इक्का दुक्का दुकान है जो चाय-नास्ता का प्रबंध रखते हैं। जैन संगठन का एक सराय भी है। श्वेतांबर जैन संगठन के वलसाड (गुजरात) निवासी किसी सेठ श्री सुन्दरलाल रैचंद जी शाह द्वारा निर्मित इस सराय में सभी तीर्थयात्रियों के लिये चाय नाश्ते और शर्बत का मुफ्त प्रबंध हैं।

मैं चाय पी कर तरोताज़ा होता हूँ और आगे की मार्ग के बारे में पूछता हूँ। पता चलता है दोनो ही मार्ग से शिखरजी पहुंचा जा सकता है। दाहिने हाथ का रास्ता अधिक चढ़ाई वाला है और पहले पार्श्वनाथ को जाता है फिर अन्य मन्दिरो को जब कि बायें हाथ का रास्ता गौतम स्वामी टोंक की ओर जाता है और फिर वहां से पार्श्वनाथ टोंक को जाया जा सकता है। मैं दाहिने हाथ का रास्ता चुनता हूँ- पहले पार्श्वनाथ के दर्शन करने के लिये और साथ ही साथ यह सोच कर कि फिर बाद का सफर थोड़ा आरामदायक होगा। इसी सीता-नाला पर गरीब आदिवसियो को जंगली जड़ी बूटी बेचते देखता हूँ। वास्तव में इन जड़ी बूटियों के बारे में इनका ज्ञान और इनके प्रत्यक्ष लाभ अद्‌भुत हैं। मैं घुटने के दर्द और अध-कपाड़ी (आधे सर में दर्द) की दो जड़ी बूटी लेता हूँ जो वापस घर आकर इस्तेमाल करने पर काफी कारगार साबित हुए। करीब आधे घंटे के आराम के बाद में पुनः अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ। अभी भी 7 किलो मीटर का सफर तय करना बाकी है। 10.30 बज चुके हैं- यानी अभी भी शिखर जी पहुंचने में 2-3 घंटे लगने हैं। दाहिने हाथ के रास्ते मैं पुनः अकेला ही चल पड़ता हूँ। किन्तु इस बार बीच-बीच में पड़ने वाले छिटपुट गाव नदारद हैं और ना ही बीच-बीच में गुजरने वाले तीर्थयात्री। चाय-नाश्ता बेचने वाले ढाबे तो बिल्कुल ही गायब हो गये हैं। मैं यह सोचकर कि आगे भी ढाबे आदि मिलते रहेंगें ना तो पानी के बोतल को भरा और ना ही कोई फल अथवा जूस लेकर रखा था। एकदम सुनसान बियावान जंगल में अकेले चलने का रोमांच बचपन की यादों को ताज़ा कर रहा था। बरबस बचपन के वे दिन याद आ गये जब हम पिताजी के साथ अभ्रक खान जाया करते थे और कोडरमा संरक्षित वन में इसी प्रकार बेधड़क घुमा करते थे। लगा मानो बचपन वापस लौट आया है। शिशिर ऋतु में महुआ की खुश्बू फ़िज़ा में फैली है और बियावान जंगल सर्वत्र पलाश के लाल फूलों से मानो शृंगार किये हुए है। एक कवि की लिखी कुछ पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं "जेखाने मुहुआरार मताल गंधे मतवारा होए, आर पलाश रंगे मेखके देहमन शुध कोरे आमि पहुँचोलम अभीष्टो (ठकुरेर) स्थाने।“ मैं भी महुआ की सुगंध और पलाश के रंग में रंगा आगे बढ़ता जाता हूँ। अगले चार- पांच किलो मीटर की सीधी चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते दम फूलने लगा। प्यास से गला सूखने लगा। जनवरी (28) के माह में भी मैं पसीने से लथपथ हुआ जा रहा था। आसमान पर छाए चंद बादल की छा भी कोई सुकून पहुंचने में विफल थी। सामने ही शिखरजी दिख रहा था और उससे एक किलोमीटर पहले पड़ने वाला संत निवास भी। लगा वापस सीता नाला लौट जाउ। सीढियों से उतरना सीढियों पर चढ़ने के बनिस्बत आसान लगा। पर यह सोचकर कि पांच किलोमीटर चलने के बाद दिन के एक बजे यदि वापस लौटा तो फिर शिखरजी पर फिर पहुंचना संभव नहीं होगा, मैं आगे बढ़ता रहा। अगले मोड पर मैं जैसे ही मुड़ा मुझे सामने ही एक आदिवासी नज़र आया। अपने जीवन में किसी मनुष्य को देख मैं कभी इतना खुश नहीं हुआ हूँगा जितनी खुशी उस अनजान आदिवासी को देख कर हुआ। उस आदिवासी ने ना केवल मेरी प्यास बुझाये वरन मीठे पपीते भी खाने को दिये जिससे मुझे नई स्फूर्ति और ताजगी मिली और शेष चढ़ाई चढ़ने का हौसला और हिम्मत भी। उस दिन संकट की घड़ी में उस आदिवासी में ही मुझे पार्श्वनाथ के दर्शन हुए। लगा मानो आदिवासी के भेष में स्वयं ईक्षवाकू राजा श्रीराम के वंशज महर्षि पार्श्वनाथ ही मेरी रक्षा को उस वियावान वन में प्रस्तूत हुए हो। अंततः करीब डेढ़ बजे मैं पार्श्वनाथ के टोंक पर उनकी समाधि के समक्ष अपना सर झुकाये खड़ा था।

जैन मत के अनुसार पार्श्वनाथ ईक्षवाकू राजा अश्वसेना और रानी वामा के पुत्र थे। वस्तूत: 24 में से 22 तीर्थंकरों ईक्षावाकू वंश से हैं, 20वे तीर्थंकर मुनिव्रत स्वामी एवं 22वे तीर्थंकर नेमिनाथ को छोड़ कर। पार्श्वनाथ का काल 877 ईसा पूर्व से 777 ईसा पूर्व का रहा। 30 वर्ष की आयु में इन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। जैन धर्म के 24 तीर्थंकारों में इनका क्रम 23वा है। महावीर स्वामी का प्रादुर्भाव इनके बाद ही हुआ था। जैन तीर्थंकरों में ये सबसे लोकप्रिय हुए और इनके नाम पर इन पर्वत श्रेणियों को पारसनाथ की पहाड़ियों से जाना जाता है। पार्श्वनाथ टोंक पर तीर्थंकर की समाधि पर मैने गरीब आदिवासियों को उसी श्रद्धा से पूजा अर्चना करते पाया जैसा अहमदाबाद, मुम्बई अथवा सुदूर शहरों से आये अमीर जैन सेठों को। यह वास्तव में ही सुखद था। पार्श्वनाथ टोंक से मैं गौतम स्वामी टोंक की ओर चला जो इस टोंक से करीब दो किलोमीटर पर दूसरी पहाड़ी पर है। यहीं से एक रास्ता तीर्थंकर चन्द्रप्रभु टोंक की ओर जाता है और दूसरा रास्ता जल मंदिर को। इसके अलावे इन्हें पहाड़ियों पर अन्य तीर्थंकर यथा अजितनाथ, संभवनाथ, अभिनंदन नाथ, सुमतिनाथ, पद्मा प्रभा, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभा, सुविधीनाथ, शीतलनाथ, श्रेयंश्नाथ, विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ, शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ, मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नेमिनाथ के भी टोंक हैं, जहाँ इन सभी तीर्थंकरों ने सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति की। इनमें से कई  ने तो कयोत्सर्ग अवस्था (खड़े अवस्था में) सिद्ध हुए और मोक्ष प्राप्त किये। प्रत्येक टोंक पर सम्बद्ध तीर्थंकर के बारे सारी जानकारी दी हुई है- यथा इनके नाम, इनका जीवन काल, इनके माता पिता और वंश का नाम , इनके प्रतिनिधि वृक्ष और प्राणी और इनकी आयु इत्यादि। श्रद्धालुजन प्रत्येक टोंक पर प्रसाद चढा, मथा टेक आगे बढते जाते हैं।

मैं वापसी यात्रा पर चल पड़ता हूँ। सूरज अब अस्ताचल की ओर अग्रसर था और मेरा लक्ष्य जल्दी से जल्दी तलहटी तक पहुचना था। निश्चय ही इन महर्षियों के अदम्य साहस और साधना सामर्थ्य से मैं अभिभूत था जिसके बल पर वे दो हज़ार साल पहले इन पहाड़ियों पर तपस्या को आये थे। किन्तु लौटते हुए जिस बात ने मुझे उध्द्वेलित कर रखा था वो था इस क्षेत्र का राज्य सरकार द्वारा की जा रही उपेक्षा- पर्वत चढ़ने के क्रम में जो भी सुविधायें यहाँ दिखी वो श्वेतांबर और दिगंबर जैन सम्प्रदाय के गुजरात अवस्थित संगठनों द्वारा की गयी है और नहीं तो किसी हद तक कुछ स्थानीय जैन संगठनों द्वारा। सरकार का योगदान शून्य प्रायः: था। संध्या पांच बजे मैं तलहटी मधुबन पहुंचने में सफल होता हूँ। तलहटी पर केन्द्रीय सुरक्षा बल की पलटन की भीड़ देख मैं अचंभित हूँ। पता चलता है कि कल ही नक्सलियों ने कुछ सरकारी अधिकारियों को अगवा कर लिया है और ये नक्सली पीरटांड में पारसनाथ की इन्हीं पहाड़ियों में कहीं छिपे हैं, जिनकी खोज हेतु कॉम्बिंग ऑपरेशन होने वाला है। अहिंसा के पावन भूमि में हिंसा का यह तांडव, गरीब आदिवासियों की बेबसी और इन सब के बीच सरकार की उदासीनता- मैं अपनी जन्म भूमि झारखंड की भाग्यहीनता पर आंसू बहाने के अलावा कुछ भी करने में अपने को बेबस पाता हूँ। एक बार मुड कर पुनः शिखरजी को प्रणाम करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि पार्श्वनाथ सरकार और सरकार के बाहर भटके हुए जन को सद्बुद्धि दे ताकि हमारा प्यारा झारखंड प्रगति की राह पर अग्रसर हो सके।




 

Sunday, January 9, 2022

THE DEMON GODDESS OF DHUNGRI' (SPEAKING TREE 09/01/2022)

THE HIDIMBA DEVI TEMPLE

MOTIF IN FRONT OF HIDIMBA DEVI TEMPLE

THE GHATOTKATCH TEMPLE


Manali is considered a favourite destination by tourists. People throng here mainly to spend their vacation in the lap of nature and enjoy the peace and tranquil environs of a hill station. But there are quite a few who visit this place for its religious importance. Just a couple of kilometres away from the main city in the Dhungri village is located the famous Hidimba Temple where people worship this female demon as a Forest Goddess or the Goddess of Nature. The locals believe that Goddess Hidimba protects them from natural calamity. The place is of mythological importance as it is associated with the Mahabharata. It is a tribute to the greatness of the Hindu religion which acknowledges a noble soul notwithstanding whether one belongs to the clan of the demons or of the devata. Hidimba joins the revered group of such pious souls as Bhakt Prahlad, Raja Bali and the likes who are worshipped even though they belonged to the demonic clan. This is symbolic of acceptance of the fact that if one mends his ways, leads a life of virtue and succeeds in killing the demon within, the kingdom of God- the Vaikuntha Dham is open to him and one may attain salvation.    

As per folklore the mighty Pandavas, who walked this earth during the Dwapar age, visited this place during their exile. The place was the abode of the famous demon king Hidimb. Hidimb challenged the Pandavas and in the ensuing fight was slain by Bhima. After her brother’s death, Hidimba sought protection from the Pandavas and on mother Kunti’s insistence, Bhima accepted to marry Hidimba.  Ghatotkacha was born out of this wedlock.

Amidst the mighty cedars on the outskirts of the village, Dhungri stands this wooden temple dedicated to the Goddess Hidimba. It is said Hidimba meditated at this place after Bhim left her to continue his onward journey with his brothers during their exile. The wood is so impressively thick that even sunlight fails to reach the ground below. An inscription engraved on a wooden panel at the side of the entrance records that the temple was caused to be built by Raja Bahadur Singh in a year corresponding to 1553 A.D. The sanctum sanctorum is covered with a three-tiered roof constructed of narrow wooden planks one over the other. The three lower ones are in the usual form projecting canopies, showing traces of the wooden fringes here and there. A large metal umbrella surmounted by a metal finial forming the fourth roof crowns the summit of the temple. On the three sides, the temple is enclosed by a narrow verandah which is raised to a height of about 12 feet above the ground. The façade and windows on each side of it are richly carved and present a handsome appearance while over the entrance is a wooden balcony. The quadruple wooden doorframe is ornamental with carvings of various deities and decorative devices such as knots, scrolls, plait works, animal figures, pot and foliage etc. Mahisasurmardini and a devotee with folded hands, Lord Vishnu with Goddess Lakshmi on Garuda are depicted on the left side. The figure of Lord Ganesha is in the centre of the lintel. On the beam above the lintel appears the Navagraha panel. The uppermost part is decorated with a motif of Buddhist characters. In view of its historical and architectural importance, the temple was declared protected as a monument of national importance as per notification no.: 4/4/67 dated 18th April 1967.

Just a furlong from the Hidimba temple is located the Ghatotkacha temple. The Dhungri village is the abode of the mighty warrior Ghatotkacha. The birth of the mighty warrior Ghatotkacha was the result of divine design. It was his role in the battle of Mahabharata that tilted the victory in favour of the Pandavas. Brave Ghatotkacha decimated the Kauravas and compelled them to summon Karna, the son of Sun-God and Kunti to match his offensive. In the bitter clash that ensued Karna was forced to use his supreme infallible weapon, which he had kept secure for use against Arjun. The exhaustion of the infallible weapon made possible the subsequent victory of the Pandavas, ensuring the rule of Dharma and upholding the resolution of Lord Krishna.

Kaamkanthaka, the wife of Ghatotkacha was a devout worshipper of Goddess Shakti who bestowed her with several boons. The legendary Barbarik, who could annihilate a whole army with a single shot of his arrow, was their brave son. Fulfilling the orders of his Guru, Barbarik had taken a vow to support the losing side during the Mahabharata war whether they were the Kauravas or his kin the Pandavas. On being demanded he offered his head to Lord Krishna and came to be known as Sheesh Dhani Baba Khaatu, who is worshipped as Baba Khaatu Shyam. A beautiful temple with fine engravings dedicated to the worship of Baba Khaatu Shyam is located close by in the Dhungri village.

This place has been the altar of worship of Veer Ghatotkacha since time immemorial. The ancient place under the tree had gone into disrepair and was renovated in 1997. In the adjoining Seraj Valley of Kullu, there are several temples and other similar places of worship dedicated to the worship of Veer Ghatotkacha.

The Hidimba temple and the Ghatotkatcha temple is testimony to the fact that even a demon of the noble soul is worth worshipping. It inspires people to tread the path of truth and nobility. It is a great lesson for people of all ages.


(Published in 'The Speaking Tree', 9th January 2022)

 

Monday, August 30, 2021

श्री कृष्ण जन्माष्टमी : श्री लीलापुरुषोत्तम की अद्भुत लीला

कृष्ण और पूतना


हम जब ईश्वर की पूजा करते हैं हम अपने आराध्य के चरण कमल में बहुत कुछ समर्पित करते हैं। किन्तु ऐसा करते हुए हम ईश्वर के समक्ष अपना सबसे बहुमूल्य चीज़ यानि अपना जीवन उत्सर्ग नहीं करते। पूतना को बालकृष्ण को न केवल गोद में खिलाने का सौभाग्य  मिला वरन यह जानते हुए भी कि वो अपनी मौत को बुलावा दे रही है उसे बालकृष्ण को दुग्धपान कराने का पुण्य भी प्राप्त है। बालकृष्ण दुग्धपान करते वक़्त अपनी पलकें झपका लेते हैं। क्यों!

कुछ विद्वानों का मत है कि श्रीकृष्ण अपनी पलकें इसलिए बंद कर लेते हैं क्योंकि उन्हें यह ज्ञात है कि दुग्धपान करते हुए उन्हें पूतना के प्राण भी हरने हैं। अतः उन्हें इस बात का दुख है कि इस अवतार में पहले पहल उन्हें एक महिला के प्राण हरने पड़े वो भी तब जब वो मातृत्व के परम स्वरूप यानि दुग्धपान करा रही हो। 

किन्तु वास्तव में कृष्ण के पलकें झपकाने की यह वजह नहीं मानी जाती। सर्वदर्शी सार्वभौम श्रीकृष्ण यह को यह पता है कि पूतना अपना जीवन उत्सर्ग करने आई है। तथापि श्रीकृष्ण को दुग्धपान करा पूतना को अपना जीवन उत्सर्ग करने में जरा भी संकोच नहीं है। यह बात ईश्वर के हृदय को कचोट रही है। पूतना ने तो बालकृष्ण के लिए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये किन्तु बालकृष्ण ने उसे प्रतिदान स्वरूप क्या दिया। इसी संकोच से श्रीकृष्ण के पलकें झपकी हुई हैं। भगवान को अपनी गोद में खिलाने और उन्हें दुग्धपान कराने के पुण्यस्वरूप श्रीनारायण उसे मोक्ष प्रदान करते हैं। यह ईश्वर का अपने भक्तों के प्रति दया-भाव का अप्रतिम उदाहरण है। इस प्रसंग का वर्णन वेंकटाद्रि कवि ने अपनी कृति लक्ष्मी सहस्त्र में बड़े करुणा भाव से किया है।      



श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा 


श्री कृष्ण जन्मस्थान मुख्य द्वार 

नंदकिला अवस्थित पूतना मोक्ष कक्ष 

इस्कॉन मंदिर में श्री राधाकृष्ण की मनोरम छवि 

बाँके बिहारी मंदिर, वृन्दावन 

 

Sunday, August 2, 2020

अयोध्या: श्री राम के देश में



भारतीय संविधान के खंड तीन "मौलिक अधिकार" में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का अंकित चित्र जो इस बात का सबूत है कि हमारे संविधान रचियताओं ने भी श्रीराम को सबसे योग्य प्रशासक और "राम राज्य" को सबसे योग्य प्रशासन शैली माना था। 


धन्य  जनमु  जगतीतल  तासु  पितहि  प्रमोदु चरित  सुनी  जासु।।
चारी  पदारथ  करतल  ताके    प्रिय  पितु-मातु  प्राण  सम  जाके।।

इस पृथ्वी तल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनंद हो। जिसको माता पिता प्राणों के सामान प्रिय हैं, चारो पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) उसके करतल गत रहते हैं।

उक्त चौपाई की चर्चा करते हुए फादर कामिल बुल्के ने अपने संस्मरण में लिखा है कि पहली बार जब उन्होंने इस चौपाई का जर्मन अनुवाद बेल्जियम में किसी पुस्तक में पढ़ा था तो उन्हें यह कतई  नहीं मालूम था कि इसे कहाँ से उधृत किया गया है। तथापि इस चौपाई से वे इतने प्रभावित हुए कि इसने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने शेष जीवन ईश्वर की भक्ति और मानव की सेवा में बिताने का निर्णय लिया। वो आगे लिखते हैं कि यह ईश्वर की मर्ज़ी थी कि उन्हें यह चौपाई पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, संभवतः ईश्वर उन्हें उस रास्ते पर ले जाना चाहता था जो उनकी नियत में लिखा था। नहीं तो कोई वजह नहीं थी कि उन्हें उसी देश में भेजा गया जिस देश के कवि की यह रचना थी। इलाहाबाद में रामकथा पर शोध करते हुए जब कामिल बुल्के को उक्त चौपाई का मूल अवधी स्वरुप अयोध्या काण्ड में पढने को मिला तब उन्होंने इसे ईश्वर की मर्ज़ी मानते हुए भारत को अपना दूसरा घर मान लिया और फिर वे यहीं के होकर रह गए। उन्होंने अपना शेष जीवन श्रीराम को समर्पित कर दिया और भारत को ही अपना कर्मस्थली बना लिया।

रामायण और महाभारत भारत के ऐसे दो महाकाव्य हैं जिसने हर काल और युग में आम जन और बुद्धिजीवियों को समान रूप से प्रभावित किया है। सदियो से इस ग्रंथ की व्याख्या विभिन्न सुधिजन अपने-अपने तरीके से करते आए हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता’ – इस ग्रंथ की  जितनी बार व्याख्या हुई, हर बार ऐसा लगा मानो कुछ अधुरा रह गया हो और फिर इसकी व्याख्या दूसरे विद्वान द्वारा की जाती रही। यही वजह है कि इस ग्रंथ के जितने अनुवाद भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में हुए हैं वो अचंभित करनेवाला है। हर भाषा के विद्वान् ने इस कथा की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की है और हर संस्करण में पढने और समझने को कुछ न कुछ नवीन मिला है। यह रामायण की विशेषता है कि इसने कितनो को कवि और कितनों को ईश्वर की शरण में डाल दिया। बरबस मशहूर विप्लवी कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की चंद पंक्तियाँ याद हो आती हैं- किस सुदूर अशोक कानन में बंदी तुम सीता,  तुम्हारा मेरा यह असीम विरह लेकर, कितने आदि कवि कितनी रामायणें रचेंगें, कौन जाने प्रिया!  

रामकथा के इसी आकर्षण से बंध मैंने अयोध्या आने का निर्णय ले लिया। श्रीराम का व्यक्तित्व का जादू ने न केवल भारत की एक अरब की जनसँख्या को प्रभावित किया है वरन दक्षिण-पूर्व एशिया के देश यथा, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मालद्वीप से लेकर यूरोप और अमेरिका तक में श्रीराम पूजनीय हैं। भारत, भारतीय संस्कृति और समाज को समझने के लिए इससे बेहतर और कोई दस्तावेज़ हो ही नहीं सकता। रामायण सदाबहार रचनावली है जिसके प्रति बुद्धिजीवियों का आकर्षण कभी कम होता नहीं दिखता। जिस प्रकार से रामायण की कथावस्तु क्रमवार खुलती है वो बुद्धिजीवियों और आमजन को समान रूप से अभिभूत करता है। फिर चाहे रामायण की प्रस्तुति पुस्तक के रूप में हो रही हो अथवा रामलीला के रूप में, लोग इससे विस्मित हुए बिना नहीं रह पाते। रामायण भारत देश का राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिनिधि ग्रन्थ है और यही वजह है इस ग्रन्थ के आंचलिक और प्रादेशिक संस्करण भी उतनी ही संख्या में उपलब्ध हैं जितनी की देश में राज्य और राज्यों की प्रादेशिक भाषा। रामायण की कथा पूरे भारतवर्ष में लोकप्रिय है और इसने पूरे देश को प्रभावित किया है। एक हिन्दू के लिए तो राम से बढ़कर और कोई बेहतर जीवन-दर्शन का उदाहरण तो दे ही नहीं सकता। हिन्दू-धर्म और संस्कृति की इससे समग्र और सही विवेचना किसी और रचना में नहीं मिलती जैसा संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में किया है। संत तुलसीदास के राम में वो सारे गुण विधमान हैं जिसकी लालसा माता-पिता अपने पुत्र में, पत्नी अपने पति में, शिक्षक अपने शिष्य में, भाई अपने भाई में और प्रजा अपनी  राजा में करती है। राम एक आदर्श पुत्र, पति, भाई और राजा के प्रतीक हैं। आज भी वे समस्त भारतवासी के लिए एक अतुलनीय उदाहरण हैं। एक हिन्दू के जन्म से लेकर मृत्यु तक जितने भी महत्वपूर्ण विधि-विधान हैं चाहे वो उपनयन संस्कार हो अथवा विद्या-अर्जन, गृहस्थाश्रम हो अथवा वान्प्रास्थ, हर सुख और दुःख की घडी में राम ही उसका आदर्श, मानसिक संबल और पथ-प्रदर्शक हैं। रामायण तत्पुरुष शब्द है जो "रामा " और "आयन" का संयुक्त अक्षर है। इसका अर्थ है राम की यात्रा। अपनी जीवनयात्रा के क्रम में राम मानो जीवन के सारे रहस्य अपने भक्तों के समक्ष खोल देते हैं ताकि विषम से विषम संकट की घडी में भी एक राम भक्त का हौसला बना रहेऔर उसका सही पथ प्रदर्शन होता रहे। राम की इसी सर्वव्यापकता की चर्चा अनेक लेखकों और कवियों ने की है। निदा फाजली लिखते है: " राम कण-कण में हैं, राम जन-जन में हैं; बचपन की मुस्कराहट में हैं राम, बहन की चूड़ियों की खनखनाहट में हैं राम, माँ के चेहरे की जगमगाहट में हैं राम, खेतों में फसलों की लहलहाट में हैं राम" तात्पर्य यह कि राम सर्वव्यापी हैं और हर उस बंधन से ऊपर हैं जो मनुष्य द्वारा धर्म और जाति के आधार पर बनाये गए हैं। आज भी एक आम हिन्दू संकट के समय अपने राम को याद करता है और उनके जीवन से शिक्षा प्राप्त करता है। राम के चरित्र में देश का चरित्र निहित है। राम का चरित्र देश को एक अलग पहचान प्रदान करता है। राम के चरित्र और कृत से प्रभावित होकर ही महात्मा गाँधी देश में "राम-राज्य" लाने की बात करते थे जो सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि, सहिष्णुता और न्याय का  समग्र मापदंड था। "राम-राज्य" उनकी नज़रों में कल्याणकारी राज्य का सबसे बेहतर उदाहरण था। यही वजह रही होगी कि हमारे संविधान रचयिताओं ने संविधान के खंड तीन जो मौलिक अधिकारों से सम्बंधित था की शुरुआत में राम, सीता और लक्ष्मण के वन गमन के चित्र को अंकित किया ताकि लोगों को रामराज्य की गरिमा का सदा ध्यान रहे और वे अपने सत्य के पथ पर सदा चले जैसा कि श्रीराम ने वन गमन के समय किया था।

इसी सर्वव्यापकता और सार्वभोम  सत्ता के महानायक की भूमि में उनसे साक्षात्कार करने की उत्कंठ लालसा मेरे मन में कई दिनों से थी जो मैं कतिपय रोजमर्रा की झंझटों की वजह से पूरा नहीं कर पा रहा था। फिर सारी लौकिक झंझटों को परे हटाते हुए मैंने अयोध्या आने का निर्णय ले ही लिया। अयोध्या के लिए मैं दिल्ली से कैफियत एक्सप्रेस से रवाना हुआ। कैफियत एक्सप्रेस रोजाना पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से संध्या समय खुलती है और लखनऊ होते हुए अगले दिन प्रातः अयोध्या पहुँचती है। आजमगढ़ तक जाने वाली इस ट्रेन का अयोध्या में दो मिनट के लिए ठहराव है। अपनी बर्थ पर सामान रख मैंने अपनी कमर सीधी की और "कैफियत" शब्द के अर्थ के बारे में सोचने लगा। ट्रेन खुल चुकी थी पर मैं अपने ही विचारों में मगन था जब मेरा ध्यान टीटीई ने तोडा और मुझे टिकट दिखाने को कहा। टीटीई को टिकट दिखाने के क्रम में मेरी नज़र उसके शर्ट पॉकेट पर टके नाम पर गया - "कुर्बान अली"  मुझे लगा "कैफियत" शब्द का अर्थ मुझे टीटीई से मिल सकता है। मैंने तुरंत अपनी जिज्ञासा टीटीई के समक्ष रखा और "कैफियत" शब्द का अर्थ बताने का निवेदन कर डाला। "महोदय, इसका मतलब है नशे अथवा उन्माद की मानसिक अवस्था।" टीटीई द्वारा दिए कैफियत की इस व्याख्या को स्वीकार करते हुए मैं एक नई सोच में डूब गया- टीटीई ने जो अर्थ बताया यदि वो सही था तो फिर ट्रेन का ऐसा नाम रखने का क्या औचित्य रहा होगा। संभवतः श्रीराम की भक्ति की उन्माद में डूबे भक्तों के नशे की बात की जा रही हो। या फिर ट्रेन का नाम मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी जिनका जन्म आजमगढ़ (जो इस ट्रेन का गंतव्य भी था) में हुआ था कि ग़ज़ल संग्रह "कैफियत" पर रखा गया हो। बहरहाल वजह जो भी रही हो दोनों ही सन्दर्भों में ट्रेन का यह नाम उचित था। ट्रेन पूरी तरह भरी हुई थी और सहयात्री के रूप में या तो श्रीराम भक्तों का साथ था या फिर साधू और फकीरों का। लोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अयोध्या जा रहे थे।  कुछ यात्री भजन गाने में मशगूल थे तो कुछ गंभीर मुद्रा में किसी गहरी सोच में डूबे हुए। सच कहा गया है कि देश की आत्मा के दर्शन भारतीय रेल के सामान्य डब्बों में ही होते हैं। अपनी परेशानियों को अपने भगवान् की झोली में डाल भारत का आम-आदमी किस प्रकार निश्चिंत होकर अपना जीवन व्यतीत करता है, वो धन ऐश्वर्य के पीछे भागने वाले,बहुधा विभिन्न रोगों से ग्रस्त, जूझते, झुंझलाते संभ्रांत और अमीर तबका को तो सपने में भी मयस्सर नहीं है। 

ट्रेन अयोध्या स्टेशन पर प्रातः नियत समय पर आ लगी। मैं अपने सामान के साथ गेट पर ट्रेन के रुकने का ही इंतज़ार कर रहा था और ट्रेन के रुकते ही मैं झट प्लेटफार्म पर कूद पडा। धार्मिक तौर पर महत्वपूर्ण, पर इस छोटे से स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव दो मिनट के लिए ही होता है। इतने समय में या तो बिना सही कम्पार्टमेंट का पता लगाए ट्रेन में चढ़ा जा सकता है या फिर ट्रेन के रुकते न रुकते कूदकर उतरा जा सकता है। औरतों और बुजुर्गों के लिए तो ये खासा तकलीफदेह है। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने एक रिक्शा किया और अपने निवास स्थान की ओर चल पडा।

अयोध्या को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यह गलत भी नहीं है। जहां हर शहर में दो चार प्रमुख मंदिर होते हैं वहाँ अयोध्या के घर-घर में मंदिर हैं जहां श्रीराम परिवार के दर्शन किये जा सकते हैं। हर घर के सामने वाले हिस्से में मंदिर का निर्माण अवश्य किया जाता है। घर-घर में स्थापित इन मंदिरों के अलावे अयोध्या में 63 वैष्णव मंदिर, 33 शिव मंदिर और 11 जैन मंदिर भी हैं। मंदिरों के अलावे 33 मस्जिद भी हैं जो भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के परिचायक हैं।  शहर में सूफी और भक्त संतों का प्रभाव भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अयोध्या इस प्रकार भारत का लघु रूप है। वर्षों से हिन्दू-मुस्लिम गंगा-जमुना के दोआब में साथ-साथ रहते आए हैं, पर नब्बे की दशक में इस मित्रता और भाईचारे में भारत के भाग्य विधाताओं की कृपा से जो दरार उत्पन्न हुए उसने न केवल गंगा-जमुनी संस्कृति को तहस नहस किया वरन सामाजिक व्यवस्था को भी तार-तार कर रख दिया। तथापि वक़्त ने मलहम का काम किया है और आज शहर में पुनः अमन और चैन व्याप्त है जो बहुत सुकून देती है। 

अयोध्या का प्रथम वर्णन स्कन्धपुराण में आता है, जहाँ इसे भारत की सात सबसे धार्मिक स्थलों में से एक माना गया है: छ अन्य हैं मथुरा, काशी, पूरी, द्वारका, कांचीपुरम और उज्जैनी(अवंतिका)। स्कन्धपुराण में इसे मछली के आकार का बताया गया है। संभवतः यही वजह है कि आज भी अयोध्या में कई घरों के मुख्यद्वार के ऊपर अर्ध-चंद्राकार आकार में मछली प्रतीक स्वरुप अंकित देखा जा सकता है। स्कन्धपुराण एक ऐसा ऐतिहासिक ग्रन्थ है जिसके विभिन्न श्लोकों में अयोध्या के विभिन्न स्थानों का वर्णन उसकी तात्कालिक महत्ता के साथ वर्णित है। पुराण का काल ईसा पूर्व का माना गया है। संभवतः जब पुराण लिखे जा रहे थे उस काल में अयोध्या उसी स्वरुप में विधमान रही हो जिसका वर्णन स्कन्धपुराण में किया गया है। पुराण, जिन्हें पांचवा वेद माना जाता है, के रचियेता वेदव्यास थे जो द्वापरकालीन युग के थे। श्रीराम इस युग से एक युग पहले यानि त्रेताकालीन युग के माने गए हैं। बहरहाल स्कन्धपुराण में रामकालीन प्राचीन अयोध्या नगरी का विस्तृत विवरण उपलब्ध है जिससे राम और रामजनम भूमि पर प्रामाणिक जानकारी मिल सकती है। यह गहन अनुसन्धान और अन्वेषण का विषय हो सकता है। अथर्ववेद में अयोध्या को भगवान् द्वारा निर्मित शहर बताया गया है, जहाँ का वातावरण स्वर्ग सा शांत और सौम्य है। भागवतपुराण में भी अयोध्या का उल्लेख आता है जहाँ इसे इक्षवाकुभूमि (इक्शावाकू  वंश की भूमि) के नाम से उद्दृत किया गया है। इसे रामपुरी और कौशलपुरी के नाम से भी जाना जाता था।  संस्कृत भाषा में अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है- युद्धयानी जिसे युद्ध से नहीं जीता जा सकता। अयोध्या को अवध के नाम से भी जाना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है "-वध" यानि जिसका वध नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार बौद्ध ग्रंथों में इस शहर को साकेत या फिर विनीता के नाम से पुकारा गया है। ध्यान आया कि श्रीकृष्ण के देश को गोकुलधाम कहा गया है तो श्रीराम के देश को साकेतधाम की संज्ञा दी गयी है जो सही भी है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र के बाद राजा राम ही अपनी समस्त प्रजा को साकेतधाम (स्वर्ग) साथ ले गए थे। चीनी यात्री फा-यान ने अपनी यात्रा वृतांत में इसे शाची नाम दिया है जबकि टोलेमी ने इसे सोगेदा नाम से पुकारा है। सरयू नदी के दक्षिण तट पर बसा अयोध्या शहर देश के विभिन्न प्रमुख शहरों से रेल और रोड द्वारा अच्छी तरह जुड़ा  है।

अयोध्या उत्तर प्रदेश में अवस्थित हिन्दुओं के तीन प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है- दो अन्य हैं मथुरा और काशी। जहाँ मथुरा का सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है वहीं काशी का वास्ता श्रीशिव शंकर से है। प्रमुख समाजवादी श्री राम मनोहर लोहिया के अनुसार "राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वपन हैं। सबका रास्ता अलग अलग है। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है, कृष्ण की उन्मुक्त या सम्पूर्ण व्यक्तित्व में और शिव की असीमित व्यक्तित्व में, लेकिन हर एक पूर्ण है। किसी एक का एक या दूसरे  से कम या अधिक पूर्ण होने का सवाल ही नहीं उठता।"उत्तर प्रदेश का यह सौभाग्य है कि ये तीनों ही तीर्थस्थल इस प्रान्त की सीमा में हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के काल पर हम नज़र डाले तो पायेंगें कि जेरूसलम को छोड़ किसी अन्य शहर को इतनी प्रमुखता से समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल में स्थान नहीं मिला है जितना अयोध्या को। यही वजह है कि इन्टरनेट एवं अन्य संचार माध्यमों में जितनी जानकारी अयोध्या के सन्दर्भ में उपलब्ध है वो किसी अन्य शहर के बारे में नहीं। अतः अयोध्या के बारे में कुछ नवीन लिखना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए मैंने अयोध्या आने का निश्चय किया ताकि उस शहर के बारे में निकट से जान सकूं जिसने विगत वर्षों में भारतीय राजनीति को उथल पुथल कर रख दिया है। इच्छा यह भी थी कि श्रीराम की उस पावन भूमि से आत्मसार कर सकूं जो श्रीराम की जनम भूमि होने की वजह से विख्यात है। परन्तु छोटे से अयोध्या स्टेशन को देखकर विस्मय हुआ। लगा ही नहीं कि यह उसी अयोध्या नगरी का रेलवे स्टेशन है जिस शहर से हर हिन्दू किसी न किसी रूप में जुडा है। स्टेशन के मुख्य-द्वार पर श्रीरामसीता की मूर्ति अवश्य लगी है पर इससे शहर की ऐतिहासिकता का अंदाज़ा लगाना असंभव था। उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग का एक छोटा सा काउंटर भी स्टेशन परिसर में है पर इसकी सार्थकता संदेहयुक्त थी क्योंकि वहां कोई अधिकारी बैठा नहीं था, वो भी तब जब शहर श्रावण मेला में श्रद्धालुओं से अटा पडा था। ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रद्धालुओं को संभवतः इस जानकारी काउंटर की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि मैंने देखा कि झुण्ड के झुण्ड ग्रामीण जत्था बना विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों को देखने समझने में यों मशगूल थे मानो उन्हें श्रीराम के अलावे इस दुनिया में किसी और से कोई कोई सरोकार ही नहीं था। मुख्य सड़क से होकर मैं अपने आवास पर आया।   

अयोध्या दर्शन की शुरुआत मैंने सरयू नदी में स्नान करने के साथ करने का निर्णय लिया। घर पर सामान आदि रख मैं सरयू घाट को निकल पड़ा। सरयू को गंगा से भी अधिक पावन माना गया है। किम्वदंती है कि जब सम्राट विक्रमादित्य प्राचीन अयोध्या की तलाश में जगह-जगह भटक रहे थे तब सरयू तट पर उनकी भेंट काले घोड़े पर सवार एक देवपुरुष से हुई। काला परिधान पहना वो देवपुरुष अपने काले घोड़े सहित सरयू में प्रवेश कर गया। परन्तु ये दोनों जब सरयू से बाहर आये तब घोडा और सवार दोनों ही धवल सफ़ेद थे। विक्रमादित्य को बड़ा आश्चर्य हुआ। पूछने पर उस देवपुरुष ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह तीर्थराज प्रयाग है जो प्रयाग में अपने पाप धोने आये श्रद्धालूओं से की वजह से हुई गन्दगी को धोने सरयू आते हैं। तात्पर्य यह कि पुण्य सलिला सरयू प्रयाग को भी स्वच्छता प्रदान करती है। माना जाता है कि जब भगवान् विष्णु ब्रह्मा से मिले तो उनके नेत्र सजल हो गए जिससे सरयू की उत्पत्ति हुई। चूकि सरयू की उत्पत्ति भगवान् के नेत्रों से हुई अतः इसे गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है क्योंकि गंगा की उत्पत्ति भगवान् की चरणों से हुई है। सावन के इस पावन माह में सरयू पूरे वेग से प्रवाहित हो रही थी। इसमें स्नान करने का आनंद ही अवर्णनीय था। सरयू तट पर कई घाट हैं जिनके नाम रामायण के विभिन्न पात्रों पर हैं- यथा रामघाट, राजघाट, जानकीघाट, लक्षमणघाट, कौशल्याघाट, कैकयीघाट, सुमित्राघाट, बिल्वाहरीघाट, वासुदेवघाट, तुलसीघाट, गुप्तारघाट, सहस्त्रधारा आदि आदि। इनमें से गुप्तार घाट का माहात्म्य सबसे अधिक है क्योंकि माना जाता है कि इसी घाट से श्रीराम ने वैकुण्ठ प्रस्थान हेतु जल समाधि ली थी। इसी तरह सहस्त्रधारा भी महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि श्रीराम के आशीर्वाद से इसी स्थान से समस्त अयोध्यावासी वैकुण्ठ को प्रस्थान किए थे। इन घाटों पर स्नान करते समय आवश्यक सावधानी बरतनी चहिये। बरसात में नदी का वेग प्रबल रहता है और बहने का भय बना रहता है। घाट के किनारे बंदरों का उत्पात भी कुछ कम नहीं होता। यदि अपने कपड़ों और सामानों की यथोचित सुरक्षा न की जाए तो ये इन बंदरों के हवाले हो जाते हैं। अतः जरूरी है कि आप जब स्नान कर रहे हों तो आपका मित्र या परिजन आपके सामानों की सुरक्षा करे और बारी- बारी से स्नान किया जाए। चूकि इन बंदरों को श्रीराम का अनुयायी माना जाता है अतः धर्मालु जन इन्हें चोट या नुक्सान नहीं पहुंचाते हैं।

सरयू घाट पर ही राम की पौड़ी का निर्माण किया गया है जहां संध्या समय सरयू आरती की जाती है। हरिद्वार की गंगा आरती की तर्ज़ पर आयोजित सरयू आरती भारत में नदियों और अन्य जल श्रोतों की महत्ता को इंगित करता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के समय सरयू आरती रोजाना की जाती है। एक हज़ार आठ दीयों के साथ अस्तगामी सूर्य के सामने सरयू की आरती के समय सारा वातावरण आलोकित हो उठा है। जल पर प्रज्वलित दीये प्रतिबिंबित हो रहे हैं जो एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहे हैं। माहौल राम मय हो गया है और मनुष्य और प्रकृति की निकटता का एहसास हो रहा है। नदी के किनारे टिमटिमाते आरती के दीये, दूर नदी पर बने पुल पर आते जाते वाहनों की टिमटिमाती बत्तियां और ऊपर अम्बर पर तारों के टिमटिमाने से एक विचित्र समा सा बंध गया है। प्रकृति और मानव के बीच के विलक्षण तारतम्य का अद्वितीय नमूना।

सरयू घाट से अब हम आगे आते हैं। अयोध्या के लगभग सभी प्रमुख मंदिर नदी की घाट से लगे हैं। फिजा में घंटी और नगाड़ों के स्वर गूंज रहे हैं। साथ ही गूँज रहे है भजन और अज़ान के स्वर जो सारे वातावरण को भक्तिमय बना रहा है। घाट के पास विभिन्न मंदिरों के होने से विभिन्न मंदिरों में दर्शन करना सहज हो जाता है।

सबसे पहले मैं नागेश्वरनाथ मंदिर का रुख करता हूँ। नागेश्वरनाथ मंदिर भगवान् शिव का मंदिर है जिसे मूलतः श्रीराम पुत्र राजा कुश ने बनवाया था। कहते हैं कि एक बार राजा कुश जब सरयू घाट पर स्नान कर रहे थे तब उनके हाथ का कंकन फिसल कर नदी में जा गिरा जिसे नागकन्या कुमुदिनी ने ले लिया। बहुत खोजने पर भी जब कंकन नहीं मिला तो कुश ने विचार किया कि हो न हो नागराज ने ही उनका कंकन ले लिया हो। यह विचार आते ही उन्होंने नागराज के संहार का निर्णय ले लिया। उधर नागराज को जब यह बात पता चला तो वो घबडाकर भगवान् शिव की शरण में गया और प्राण की रक्षा की गुहार करने लगा। अंत में भगवान् शिव ने स्वयं प्रकट होकर राजा कुश को उनका कंकन वापस दिलवाया और नागराज को क्षमा करने को कहा। राजा कुश भगवान् शिव के आगे नतमस्तक हो गए और उन्होंने यहाँ पर शिव की पूजा की जहां अब नागेश्वरनाथ मंदिर अवस्थित है। कालान्तर में राजा विक्रमादित्य ने इस मंदिर को खोज निकाला था और इसका पुनरुद्धार करवाया था। मध्यकाल में यह मंदिर जब पुनः जर्जर अवस्था में था तब इसका पुनरुद्धार अट्ठारवीं शताब्दी में नवलराय द्वारा करवाया गया। नवलराय के पूर्वज इटावा के सक्सेना कायस्थ थे जो पेशे से कानूनगो थे। अवध के तात्कालिक नवाब सफ़दरजंग के दरबार में नवलराय को नायब-सूबेदार का पद प्राप्त हुआ। अपनी बुद्धि और कौशल से नवलराय नवाब सफ़दरजंग का विश्वास हासिल करने में कामयाब हुआ और नवाब ने उसे अयोध्या का राजा घोषित कर दिया। 1739-1750 के अपने शासनकाल में नवलराय ने अयोध्या के कई ऐतिहासिक मंदिरों का पुनरुद्धार करवाया जिसमे नागेश्वरनाथ का यह मंदिर भी था। इसी शताब्दी के अंत में इस मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा भी करवाया गया जिसके प्रमाण स्वरुप शिलालेख यहाँ अंकित हैं। 

देवी अहिल्याबाई होलकर ने न केवल नागेश्वरनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया वरन अयोध्या में कई नए मंदिरों और घाटों का निर्माण भी करवाया। साधू और संतों के विश्राम हेतु धर्मशालाओं का निर्माण भी रानी द्वारा करवाया गया। इनमे से प्रमुख हैं श्रीराम मंदिर, श्रीभैरव मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, स्वर्गद्वारी मोहताज खाना और सरयू पर घाट।

नागेश्वरनाथ मंदिर के बगल में ही कालेराम का मंदिर हैं। माना जाता है कि मध्यकाल में जब मुस्लिम शासकों ने अयोध्या पर आक्रमण  किया तब जनम भूमि की मूर्ति को सरयू में प्रवाहित कर दिया गया था ताकि ये मुस्लिम आक्रमणकारी के हाथ न लगें। बाद में इस मूर्ति को सरयू से निकाला गया और कालेराम मंदिर में राजादर्शन सिंह जी और पंडित नरसिंह राव मोघे द्वारा 1748 में प्रतिष्ठित किया गया। यह मूर्ति राम दरबार की है यानि भगवान् राम, देवी सीता, भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ वीर हनुमान एक साथ एक काले शिला पर अंकित है। चूकि मूर्ति काले पत्थर की है अतः इसे कालेराम की संज्ञा दी गयी। कालेराम मंदिर में ही दक्षिणमुखी हनुमान के दर्शन हुए और दर्शन हुए गणपति बाप्पा के जिनकी खासियत है उनकी सूंड जो दक्षिणवर्ती है।

कालेराम मंदिर के ही एक कक्ष में हस्तलिखित प्राचीन हिन्दू ग्रन्थ रखे गए हैं। इन ग्रंथों में 18 पुराण, 4 वेद, 6 शास्त्र वाल्मीकि रचित रामायण, संत तुलसीदास रचित रामचरितमानस, 108 उपनिषद् और 15 करोड़ रामनाम शामिल हैं। ये सारे के सारे ग्रन्थ हस्तलिखित हैं और मंदिर के व्यवस्थापक श्री यशवंत राव देशपांडे के अनुसार इनकी लिखने की तिथि अज्ञात है।

कालेराम मंदिर के बगल में ही त्रेता राम का मंदिर अवस्थित है। मंदिर का पट बंद था। मंदिर के पुजारी ने बताया कि इस मंदिर के पट हिंदी पंचांग के अनुसार केवल एकादशी के दिन खुलते हैं। त्रेता राम के वर्त्तमान मंदिर का निर्माण कुल्लू के राजा द्वारा तीन सौ वर्ष पूर्व करवाया गया था। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कार द्वारा अट्ठारवीं शताब्दी के अंत में किया गया। भगवान् राम त्रेता युग में अवतरित हुए थे। फिर भी उनके नाम पर मूर्ति की स्थापना करना जब कि वे स्वयं साक्षात उपस्थित थे, ने मुझे अचंभित किया। मेरी उत्कंठा का समाधान करते हुए  मंदिर के पुजारी ने स्पष्ट किया कि वनवास से लौटने के बाद  श्रीराम ने जब अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया था तो यह पूजा देवी सीता की अनुपस्थिति में संभव नहीं था। पर श्रीराम ने स्वयं ही देवी सीता को वन में वाल्मीकि आश्रम में निर्वासित कर दिया था। फिर यह रास्ता निकाला गया कि देवी सीता की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित कर पूजा संपन्न किया जा सकता है। बाद में जब यज्ञ के अश्व को लव- कुश ने रोक लिया और सारे महारथी लव-कुश से युद्ध में पराजित हो गए तो श्रीराम को स्वयं युद्ध में उतरना पड़ा। पर यज्ञ स्थल पर भी उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। अतः समाधान यह निकाला गया कि देवी सीता की ही तरह श्रीराम की भी स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना कर दी जाए। इस प्रकार श्रीराम के जीवन काल में ही उनकी स्वर्ण प्रतिमा का निर्माण हुआ और उसे यज्ञ स्थल पर स्थापित कर वे स्वयं युद्ध को अग्रसर हुए, जहां उनका अपने पुत्रों और पत्नी से पुनः मिलन हुआ। आज श्रीराम और देवी सीता की स्वर्ण प्रतिमा तो उपलब्ध नहीं हैं पर इस घटना की स्मृति में इस मंदिर को त्रेता राम का मंदिर कहा जाने लगा क्योंकि अश्वमेध यज्ञ इसी मंदिर प्रांगन में संपन्न हुआ था।

श्रीराम के जीवनकाल को देखे तो हम पायेगें कि उन्होंने दो अवसर पर ऐसे बड़े अनुष्ठान किये। सर्वप्रथम लंका युद्ध के दौरान जब युद्ध उनकी अपेक्षा से अधिक लंबा खीचने लगा तो उन्होंने शक्ति की देवी दुर्गा का आवाहन किया और युद्ध में विजय हेतु आशीर्वाद प्राप्त किया था। श्रीराम शक्ति की पूजा करते हैं - ठीक उसी रूप में जिस रूप में नवरात्र में होती है। शक्ति नवरात्र के अंतिम दिन अर्थात नवमी को राम द्वारा अर्पित किये जाने वाले नौ कमलों में से एक कमल भगवान् शिव छिपा लेते हैं। राम अपनी एक आँख निकालकर अपने कमल नयन देवी को अर्पित करते हैं, जब भगवान् शिव और देवी दुर्गा दोनों ही उपस्थित होकर श्रीराम को विजय का आशीर्वाद देते हैं। इसका वर्णन कवि कृत्तिवासा रचित बांग्ला रामायण में है। बाद में राष्ट्रकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने अपने ग्रन्थ "राम की शक्ति पूजा" में इसका विशद वर्णन किया है। राम की शक्ति पूजा का मूल अभिप्राय यह है कि इस संसार में सफलता के लिए शक्ति आवश्यक है। देवी सीता शक्ति की ही प्रतिरूप हैं। पर भगवान् राम जब देवी सीता की जगह उनकी स्वर्ण प्रतिमा के सहारे अश्वमेध यज्ञ करते हैं तो उसमें नाना प्रकार की बाधाएं आती हैं। और तो और इस बार उनका मुकाबला अपने ही पुत्रों से होता है जिनका पलड़ा भारी है क्योंकि शक्ति की प्रतिरूप देवी सीता श्रीराम के साथ नहीं हैं। वाल्मीकि आश्रम में देवी सीता अपने पुत्रों के साथ है यानि शक्ति लव-कुश के पक्ष में है। राम और उनके पुत्रों के बीच युद्ध ऐन वक़्त पर टल जाता है और श्रीराम का अपने परिवार से पुनर्मिलाप होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विजय उसे ही प्राप्त होती है जिसे शक्ति की देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त है। बंगाल में देवी पूजा की महत्ता है और कृत्तिवासा द्वारा इस प्रसंग का उल्लेख इस महत्ता को स्थापित करने में सफल होता है।

शक्ति पूजा की बात चली है तो बताते चले कि यहाँ छोटी देवकाली का मंदिर भी दर्शनीय है। हालांकि यह मंदिर छोटा है पर इसका माहात्म्य बहुत अधिक है। कहते हैं देवी सीता जनकपुरी से जब  विदा हुई तो माँ काली की वह मूर्ति साथ लाई जिनकी वो जनकपुरी में नित्य पूजा करती रही थी। अयोध्या आकर इस काली की मूर्ति को छोटी देवकाली मंदिर में स्थापित किया गया। अतः इसे अब छोटी देवकाली मंदिर के नाम से जाना जाता है। छोटी देवकाली की ही तरह बड़ी देवकाली मंदिर का भी वर्णन शास्त्रों में मिलता है। बड़ी देवकाली का मंदिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर अवस्थित है और यह श्रीराम की कुलदेवी थी। यहाँ माँ काली, माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।

मैं और आगे बढ़ता हूँ। अब मैं वाल्मीकि मंदिर परिसर में हूँ। वाल्मीकि मंदिर अपनेराम बैंकके लिए विख्यात है। राम बैंक रामभक्तों द्वारा सादे कागज़ पर लिखे सीताराम को जमा लेता है और इन भक्तों को इसकी रसीद भी देता है। हर भक्त के नाम से खाता खुला हुआ है। भक्त अपने लिखे "सीताराम" यहाँ जमा करते हैं और उनके द्वारा अब तक जमा रामनामा की रसीद दी जाती है। सब कुछ बड़े ही व्यवस्थित ढंग से किया जाता है जैसे कि और बैंकों में लोगों की धनराशि जमा ली जाती है वैसे ही राम बैंक मेंरामनामाजमा ली जाती है। इस प्रचलन का उल्लेख  करते हुए महात्मा गाँधी अपनी पत्रिका हरिजन में लिखते हैं कि रामनामा में बहुत शक्ति है बशर्ते राम भक्त ह्रदय से इसे लिखे और इसका पाठ करें। (हरिजन,  13.10.1946)

पास में ही कनक-भवन है।  कनक यानि सोना। स्वर्ण निर्मित यह भवन त्रेता काल में माता कैकेयी ने अपनी प्रिय पुत्र वधु देवी सीता को विवाहोपरांत मुंह दिखाई स्वरुप दी थी। माना जाता है कि द्वापर में जरासंध का संहार करने के बाद श्रीकृष्णा इस भवन में कुछ समय रुके थे। मंदिर में लगे एक शिलालेख के अनुसार रामकालीन कनक-भवन का प्रथम पुनरुद्धार राजा कुश ने द्वापर काल में किया। बाद में राजा विक्रमादित्य ने इसका पुनरुद्धार युधिष्ठिर संवत 2431में किया। कनक-भवन रामकालीन वे पांच मंदिर और भवन हैं जिनका पुनरुद्धार का उल्लेख विक्रमादित्य कालीन इतिहास ग्रंथों में मिलता है- ये हैं श्री जनम भूमि मंदिर जहाँ श्रीराम का जनम हुआ था, रत्न सिंहासन जहाँ श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था, सहस्त्रधारा के समीप लक्षमण शेषनाग मंदिर, बड़ी देवकाली मंदिर जिसे आदि शक्ति मंदिर भी कहा जाता है और कनक-भवन। 444 इसवी में इस मंदिर का पुनरुद्धार गुप्त राजा समुद्रगुप्त द्वारा करवाया गया। सन 1084 इस भवन को सालारजंग द्वारा क्षति पहुंचाई गयी पर बाद में ओरछा की रानी कृष्णा भानु देव कुंवरी द्वारा इसका पुनरुद्धार करवाया गया जो कि भवन का वर्तमान स्वरुप है।  ओरछा की रानी कुँवरी गणेश भगवान् राम की अनन्य भक्त थी और उनहोंने श्रीराम को ओरछा ले जाने की जिद ठान रखी थी। एक दिन सरयू में स्नान करते समय उन्हें श्रीराम की एक मूर्ति मिली। इस मूर्ति को वे ओरछा ले गई जहां उन्होंने श्रीराम की इस मूर्ति का विधिवत राज्याभिषेक कर ओरछा की राजगद्दी सौंप दी और स्वयं एक सन्यासी की तरह जीवनयापन करने लगी। चूकि उन्हें  आराध्य देव श्रीराम अयोध्या में मिले थे, अतः इसी वंश की रानी कृष्णा भानु देव कुंवरी ने कनक-भवन का पुनः निर्माण कर राम-सीता को वहां पुनर्स्थापित किया। कनक-भवन में राम सीता की तीन मूर्तियाँ विधमान हैं जो तीन आकार की हैं। श्रावण माह में इनमें से सबसे बड़ी जोड़ी भवन में ही रहती है। मध्य आकार की दूसरी जोड़ी को मंदिर परिसर में ही झूले पर स्थापित कर झुलनोत्सव होता है। तीसरी जोड़ी को एक झांकी में मणिपर्वत ले जाया जाता है जहाँ भक्तों की अपार उपस्थिति में उन्हें श्रावण झूले में झुलाया जाता है। श्रावण मास में कनक-भवन की सजावट और खूबसूरती देखते ही बनती है। जिस प्रकार रामभक्त विह्वल होकर श्रीराम सीता की झांकी निकालते हैं और उन्हें श्रावण झूले में झुलाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान् साक्षात उपस्थित हैं।          

कनक भवन से निकल कर मैं झांकी में राम भक्तों के साथ साथ मणि पर्वत की ओर चलता हूँ। मणिपर्वत वह स्थान है जहां राजा दशरथ ने जनक से मिले दहेज़ की सारी कीमती रत्न, आभूषण, स्वर्ण, आदि रखवा छोड़े थे। राजा जनक ने सीता को विदाई के समय यथोचित धन सम्पदा, सोना, चांदी, रत्न, कीमती पत्थर और आभूषण के साथ विदा किया था। महाराज दशरथ चूकि खुद सुविधा संपन्न थे अतः उन्होंने इस समस्त वस्तुओं को इस स्थान पर रखवाया जिसने पर्वत का रूप अख्तियार कर लिया।रत्न आभूषण और मणिसे बने इस पर्वत को इसलिए मणिपर्वत नाम दिया गया। मणिपर्वत का दृश्य ह्रदय स्पर्शी था। भक्तों का विशाल हुजूम अपने राम सीता की जोड़ी की झलक पाने को व्यग्र था। स्थानीय प्रशासन स्थिति को नियंत्रण में रखने का हर संभव प्रयास कर रहा था। हिन्दू धर्म और आस्था में श्रावण झूले का अलग ही महत्व है। गृहस्थ जीवन की भाग दौड़ में लोग भले अब इन सब विषयों में ज्यादा समय न दे पाते हो पर राम भक्तों का उत्साह यहाँ देखते ही बनता है।हर मंदिर से राम सीता की जोड़ी यहाँ पर आती है और पर्वत पर बने विभिन्न झूले पर इन्हें झुलाया जाता है। फिर इन्हें वापस उनके मंदिरों में ले जाया जाता है।छोटे छोटे बालकों का राम सीता के रूप में श्रृंगार  कर उन्हें राम सीता का रूप मन कर भक्त उन्हें झूले पर झुलाते हैं। 

मणिपर्वत से लौटते हुए मैं हनुमानगढ़ी में रुक जाता हूँ। हनुमानगढ़ी एक टीले पर अवस्थित हनुमान मंदिर है। मंदिर तक जाने के लिए सीढी बने हैं। 76 सीढियां चढ़ मैं हनुमानगढ़ी के मुख्य दरवाज़े पर खड़ा हूँ। सांस धौकनी की तरह चल रही है। सांस को संयत कर मैं मंदिर की मूर्ति को देखने लग जाता हूँ। यहाँ हनुमान अपने पारंपरिक रूप में नहीं हैं। हनुमान की छवि हर भक्त में संजीवनी पर्वत उठाये पवन-पुत्र की मुद्रा की रहती है और यही छवि हनुमान मंदिरों में मूर्तियों में भी दिखती है। किन्तु हनुमानगढ़ी में बाल हनुमान की मूर्ति है जो अपनी माता अंजनी की गोद में बैठे दिखाए गए हैं। कहा जाता है कि वैकुण्ठ जाते हुए, जल समाधि लेने से पूर्व श्रीराम ने अयोध्या की बाग़डोर हनुमान के हाथों में सौंपा था और तब से भक्तगण हनुमान को अयोध्या का राजा मानते आये हैं। यह भी कहा जाता है कि श्रीहनुमान इस टीले से रामकोट पर नज़र रखते हैं और उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं। हनुमानगढ़ी एक गढ़ अथवा किला स्वरुप दिखता है जिसका पुनर्निर्माण नवाब शुजाउद्दौला के शासन काल में स्वामी अभयराम दासजी द्वारा करवाया गया था। वर्तमान गढ़ तीन सौ वर्ष पुराना है। हनुमानगढ़ी का मंदिर परिसर काफी विशाल है जिसमे एक ओर साधुओं का अखाडा है, दूसरी ओर गोशाला है, तीसरी ओर लंगर और चौथे कोने पर रामायणी है जहां रामायण पाठ होता रहता है। इस परिसर में चार मठ महत्व के हैं जिन्हें क्रमश हरिद्वारी, बासतिया, उज्जैनी और तिकैती के नामे से जाना जाता है। इसके अलावे एक संस्कृत विद्यालय भी इस मंदिर परिसर में अवस्थित है। सर्व धर्म समभाव को अभिव्यक्त करता सतयार मंदिर भी इस परिसर में ही है जहां भगवान् राम के अलावे गौतम बुद्ध, वर्धमान महावीर, ज़रथुस्त्र और मक्का-मदीना के चित्र अथवा मूर्ति स्थापित हैं। हिन्दू सहिष्णुता और दयालुता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है? प्रत्येक वर्ष हनुमान जयंती के दिन इस मंदिर में हनुमान जी का जन्मदिन बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। कार्तिक माह के कृष्णा पक्ष में दीपावली से एक दिन पहले चतुर्दर्शी को हनुमान जयंती के दिन यह मंदिर परिसर रौशन रहता है और हनुमान भक्त रात्रि जागरण कर भजन आदि करते हुए हनुमान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रदर्शित करते हैं। पहले श्रीहनुमान को तोपों की सलामी भी दी जाती थी जो अब पटाखों तक सीमित रह गया है।    

मठ की उपस्थिति अयोध्या शहर का एक वैशिष्टय है। इन मठों का सञ्चालन साधुओं द्वारा होता है और कई मठ तो काफी प्रभावशाली और समर्थवान हैं। एक समय था जब अयोध्या में गृहस्थों का निवास वर्जित था। उस दौर में अयोध्या में केवल मठ थे और मठों में रहने वाले साधू। प्रमुख मठों में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं: मनीराम दासजी की छावनी, श्री रघुनाथ दासजी की छावनी, गोकरन पतंजलि जेवोत्तम मठ, खाकी अखाडा, राम हर्षण कुञ्ज, हरिराम हनुमत सदन, लक्षमण किला, सुग्रीव किला, अशर्फी भवन, गोकुल भवन और लाल कोठी। पहले इन मठों को राजा रजवाड़ों का वरद्हस्त प्राप्त था। राजा रजवाड़ों के जाने से यह संरक्षण जाता रहा और इनमें से कई मठ आज जर्जर अवस्था को प्राप्त हो गए हैं।

मठों की ही तरह अयोध्या में आश्रमों की भी परंपरा रही है। लोमस ऋषि का आश्रम, अगस्त्य आश्रम, पाराशर आश्रम आदि कुछ महत्वपूर्ण आश्रम का वर्णन आदि ग्रंथों में मिलता है जो आज भी विधमान हैं। पर इनमें से सबसे महत्वपूर्ण वशिष्ठ मुनि का आश्रम हैं जहाँ श्रीराम अपने तीनों भाइयों के साथ गुरु वशिष्ठ से शिक्षा अर्जन किये थे। तमसा नदी पर गुरु वाल्मीकि का आश्रम भी है जहां माँ सीता निर्वासन के समय अपने पुत्रों के साथ रही थी। इसी आश्रम में गुरु वाल्मीकि की शिक्षा-दीक्षा में लव-कुश बड़े हुए थे। यहाँ से थोड़ी दूर पर ही प्रख्यात नंदीग्राम अवस्थित है। इसी स्थान पर राजकुमार भरत ने श्रीराम की प्रतीक्षा में चौदह वर्ष बिताये और उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुका के सेवक के रूप में अयोध्या के शासन का सञ्चालन किया था।

अयोध्या में आप जहां कहीं भी चले जाए आपको रामयुगीन स्थानों और नामों के ढांचे नज़र आयेगें जो अब बहुत ही जर्जर अवस्था को प्राप्त हैं। पूरे अयोध्या शहर में रामयुगीन अवशेषों के दर्शन होंगे जो इस बात के मूक गवाह हैं की कभी इस भूमि पर श्रीराम के चरण पड़े थे। आगे राम दुर्ग है जो श्रीराम का किला है। इसी के बगल से आप सीता रसोई की ओर जा सकते हैं। सीता रसोई वह जगह है जहां माना जाता है माँ सीता रसोई बनाती थी। कभी यह सोचे कि माँ सीता साक्षात् लक्ष्मी स्वरूप होकर भी अपने पति के लिए रसोई तैयार करती थी तो आपको रिश्तों की गरिमा का पाठ भी पढने को यहाँ मिल जाएगा। सीता रसोई के बगल में ही सीता कूप है जिस कुएं के जल का प्रयोग सीताजी करती थी। इसी प्रकार आगे अशोक वाटिका है जहां राम सीता संध्या भ्रमण करते थे। और आगे जाए तो सिद्धपीठ के दर्शन होंगे। जानकी महल और इस मंदिर परिसर में अवस्थित राम जानकी मंदिर, हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और गणेश मंदिर, इन  चारों मंदिरों का पुनरुद्धार स्वतंत्रता उपरांत मोहन लाल केजरीवाल द्वारा करवाया गया था।

मुझे इस बात का दुःख और क्षोभ था कि एक पूरा शहर जो राम के कार्य और काल का धरोहर है उसे यों ही टूटने-फूटने और रसातल में जाने कैसे दिया जा सकता है? विभिन्न हिन्दू धर्मशास्त्रों और ग्रंथों में ऐसे कई मंदिरों और स्थानों का वर्णन मिलता है जो अब वास्तव में मौजूद नहीं हैं। संभवतः इन वर्षों में या तो वे टूट-फूट कर इतिहास की गर्भ में समा गए या फिर इन्हें परिवर्तित कर दिया गया। आज भी मध्यकालीन ऐसे कई इमारत, मंदिर और अन्य पूजा स्थल हैं जो जर्जर अवस्था में है। बहुत संभव है कि आने वाले वर्षों में इनका वजूद ही न रहे। पर इससे यह निष्कर्ष कदापि नहीं निकालना चाहिए कि अतीत में इन इमारतों अथवा पूजा स्थलों का वजूद ही नहीं था। इन्टरनेट पर जाए तो आज विकिपीडिया भी इस बात को स्वीकार करता है कि कभी अयोध्या में श्रीराम का राज्य था।

पर मेरा प्रश्न उन सभी देशवासियो से है जो अपने इतिहास, अपनी साझी संस्कृति और आपसी भाईचारे की परंपरा पर गर्व करते हैं। मेरा सवाल न केवल हिन्दू बुद्धिजीवियों से है वरन मुस्लिम बुद्धिजीवियों से भी है कि क्यों नहीं यह समुदाय सामने आता है और श्रीराम की धरोहर को सुरक्षित करने में हाथ बटाता है। एक ओर हम गंगा-जमुनी संस्कृति की चर्चा करते हैं और दूसरी ओर ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों, भवनों और इमारतों के संरक्षण के मसले पर एक मत नहीं हो पाते। यह निश्चय ही हमारी बौद्धिकता निरर्थकता को इंगित करता है। यह हकीकत है कि किसी भी देश की सांस्कृतिक विरासत इतनी वैभवशाली नहीं है जितनी की अपने देश भारत की। पर आज के दौर में यह भी सच है कि किसी भी देश के बुद्धिजीवियों की अकर्मण्यता इतनी प्रबल नहीं है जितनी की अपने देश की। जिस देश के लोग, सन्तति और समाज अपनी विरासत की रक्षा करने में असक्षम है उस देश की स्वतन्त्रता पर आंच आना ही आना है।  

बहरहाल मैं और आगे बढ़ता हूँ। श्रीराम की इस नगरी में घूमते हुए मैं अयोध्या से बाहर निकल चुका हूँ। एक बोर्ड लगा दिखता है जो चौरासी कोसी परिक्रमा का दिशा निर्देश इंगित कर रहा है।अयोध्या अपनी परिक्रमाओं के लिए भी जाना जाता है। परिक्रमा एक निश्चित पैदल पथ है जो धार्मिक महत्व के कुछ मंदिरों के चारो ओर राम भक्तों द्वारा पैदल चलकर पूर्ण किया जाता है। स्कन्धपुराण में इन परिक्रमाओं का उल्लेख मिलता है जहाँ इससे मिलने वाले पुण्य को अश्वमेध यज्ञ के पुण्य से भी बड़ा माना गया है। पांच कोसी परिक्रमा, चौदह कोसी परिक्रमा और चौरासी कोसी परिक्रमा जिनका यात्रा मार्ग क्रमश पांच, चौदह और चौरासी कोस है, ये तीन प्रकार की परिक्रमाओं का विधान है।

अयोध्या भ्रमण के दौरान ही अयोध्या शोध संस्थान में भी जाने का अवसर मिला। अयोध्या शोध संस्थान की स्थापना 1986 में हुई थी। यहीं तुलसी स्मारक भवन भी है। संत तुलसीदास रामचरितमानस लिखने के क्रम में 1631 में अयोध्या पधारे थे और यहाँ तक़रीबन तीन साल का प्रवास किया था। शहर के मुख्य बाज़ार में तुलसी उद्यान इस बात का गवाह है। संत तुलसीदास ने ही रामलीला की परंपरा डाली थी। आज अयोध्या शोध  संस्थान में अनवरत रामलीला का आयोजन किया जाता है।1988 में पहली बार साप्ताहिक रामलीला के मंचन का निर्णय वीर बहादुर सिंह की सरकार ने लिया था जिसे 2004 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बदलकर रोजाना करने का निर्णय लिया। आज तक 200 से अधिक रामलीला मंडलियों द्वारा इस संस्थान के प्रेक्षागृह में रामलीला का मंचन हुआ है। न केवल उत्तर-प्रदेश वरन बिहार, छतीसगढ़, मध्य-प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडू, महारास्ट्र, ओडिशा, असम और कर्नाटक के कलाकारों द्वारा रामलीला का मंचन यहाँ हो चुका है। इन प्रस्तुतियों का सबसे दिलचस्प पहलु यह है कि हर मंडली न केवल अपने आंचलिक परिवेश में मंचन करती है वरन हर मंडली अपने क्षेत्रीय भाषा के रामायण का मंचन करती है। अतः जहाँ दर्शक उत्तर-प्रदेश की अवधी रामलीला का आनंद लेते हैं वहीं बिहार की मिथिला शैली, असम की अंकियानट, उत्तराखंड की कुमायूंनी शैली में रामलीला का मंचन का आनंद भी लेते हैं।  इसी प्रकार बंगाल के कलाकार कृत्तिवासा रामायण का, मराठी कलाकार माधव कन्दली रचित कथा रामायण का, तमिल कलाकार कंबन रामायण का और तेलुगु कलाकार रंगनाथ रामायण का मंचन यहाँ कर चुके हैं।

अयोध्या की भूमि न केवल हिन्दू संस्कृति की संरक्षक रही है वरन इसने सूफी और भक्त संतों को भी प्रश्रय दिया है। जैन और बौद्ध  प्रभाव भी यहाँ स्पष्ट देखे जा सकते हैं। हज़रात शीश की दरगाह अयोध्या में ही है। फिरदौस पंथ के सूफी संत शेख जमाल गुज्जरी भी अयोध्या में ही बसते थे। इसी प्रकार दरगाह नौगाज़ी और पीर नुह अलेही सुलेमान का दरगाह भी अयोध्या में अवस्थित है। इन सूफी और भक्त संतों ने आपसी भाईचारे और सहिष्णुता का वहीं पाठ यहाँ के लोगों को पढ़ाया जो रामायण में वर्णित है। यहीं वजह है कि सारे देश में राम जनम भूमि का दावानल फैलने के बावजूद अयोध्या में धार्मिक सहिष्णुता और एकता बनी रही। इसे श्रीराम की तेज का ही प्रताप माना जा सकता है कि आपसी सौहार्द और भाईचारे का जो सन्देश उहोंने दिया है उसने लोगों को संयम से काम लेने का बल दिया और देश पुनः सामान्य अवस्था की ओर अग्रसारित हुआ। सहिष्णुता और समभाव के जो आदर्श श्रीराम ने सामने रखा है वो हर हिन्दू को सही और गलत की पहचान कराता है।

जैन संप्रदाय के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच का जनम स्थान अयोध्या है। ये तीर्थंकर थे- ऋषवदेव, अजिनाथ, अभिनंदनाथ, अनंतनाथ और सुमतिनाथ। माना जाता है कि अयोध्या के ब्रह्मकुंड आकर गुरु नानक देव और गुरु गोविन्द सिंह कुछ समय समाधिस्त रहे थे। श्रीराम का प्रभाव गुरु ग्रन्थ साहब में स्पष्ट दिखता है जिसमे उनका नाम 2500 और हरि का उल्लेख 8000 बार आता है।

अयोध्या की गलियों में घूमता हुआ, मंदिरों में श्रीराम को ढूंढता हुआ एक बात जो मन को विचलित किये हुई थी वो थी यहाँ के मंदिरों, मठों और कुंडों की जर्जर स्थितिके प्रति आकुलता। अधिकतर मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। अंग्रेजों के शासनकाल में तात्कालिक राजाओं द्वारा इन मंदिरों का रखरखाव किया जाता रहा होगा पर आज इनपर न देश के शासक का और न ही धार्मिक संगठनों का ध्यान है। ये धार्मिक संगठन यो तो रामजनम भूमि के लिए मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं पर अपनी विरासत की इन अन्य महत्वपूर्ण निशानियों के संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। इसलिए कभी-कभी महसूस होता है कि राम मंदिर के निर्माण की आड़ में ये संगठन घिनौनी राजनीति कर रहे हैं। उन्हें न अयोध्या की विरासत से मतलब है और न ही यहाँ के लोगों के अमन चैन से। वे केवल अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के उपाय में मशगूल हैं। यदि अपनी विरासत का उन्हें इल्म होता तो ये संगठन आज अयोध्या की इन सारी ऐतिहासिक मंदिरों, मठों, घाटों और कुंडों कायाकल्प कर देते। मन इन मंदिरों की जर्जर अवस्था को देखकर विद्वेलित हो चुका था। मैं अपने प्रश्न के उत्तर की तलाश में घूमता हुआ शहर छोड़ने से पहले एक अंतिम बार सरयू घाट पर आ बैठा था। सरयू आरती का समय हो रहा था। अस्तगामी सूर्य के पीत प्रकाश से पूरा माहौल स्वर्ण सा चमक रहा था। तभी एक वृद्ध महिला बगल में आ कर बैठ गयी।

"क्या तुम्हे आरती देखने नहीं जाना है? यहाँ बैठे क्या सोच रहे हो?" महिला ने बिना परिचय के पुछा।

मैंने भी बिना संकोच अपनी बात उनके सामने रख दी।

"बेटा, अयोध्या के इस क्षरण और दुर्दशा के लिए तुम्हारा चिंतित होना सही है। पर जब इसी अयोध्या में देवी सीता को सुख और शांति नहीं प्राप्त हुई तो फिर यहाँ के लोग कैसे सुखी, संपन्न और समृद्ध रह सकते हैं? बेटा, देवी सीता लक्ष्मी की साक्षात अवतार थी। पर अयोध्या के लोगों ने लक्ष्मी की इस साक्षात अवतार सीता मैय्या को दुःख पहुँचाया था। इसका श्राप तो इन्हें मिलना ही मिलना था। इसलिए तुम दुखी मत हो और जो हो रहा है उसमें अपना मन लगाओ। जाओ सरयू आरती का आनंद लो।" ये कहते हुए वो महिला खुद उठ गयी और भीड़ में जाने कहाँ खो गई पता ही नहीं चला।

सरयू आरती में भाग लेने के बाद मैं वापस अपने आवास पर आया और अपने सामान बाँध स्टेशन की और चला। ट्रेन में अपने बर्थ पर सामान रख ही रहा था जब ध्यान भजन और अजान की मिश्रित आवाज से टूटा। कहीं बापू का प्रिय भजन हो रहा था " रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम"।दूसरी ओर अजान का मीठा स्वर फिजा में गूँज रही थी। मुझे लगा कि जब तक राम-रहीम की जोड़ी सलामत है देश सुरक्षित रहेगा चाहे फिर उन्हें तोड़ने का प्रयास देश के अन्दर से हो अथवा बाहर से। देशवासियों ने इन विपरीत परिस्थितियों का सामना पहले भी सफलता पूर्वक किया है और श्रीराम की कृपा से आगे भी करते रहेंगें। इसी उम्मीद से उत्साहित हो कर मैं खिड़की से बाहर दूर जाते अयोध्या को देखता रहा जब तक वो नज़रों से ओझल न हो गई। बरबस कवि अल्लाहमा इकबाल की चंद पंक्तियाँ याद हो आई- है राम के वजूद पर हिंदोस्ताँ को नाज़, अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द