Sunday, August 2, 2020

अयोध्या: श्री राम के देश में



भारतीय संविधान के खंड तीन "मौलिक अधिकार" में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का अंकित चित्र जो इस बात का सबूत है कि हमारे संविधान रचियताओं ने भी श्रीराम को सबसे योग्य प्रशासक और "राम राज्य" को सबसे योग्य प्रशासन शैली माना था। 


धन्य  जनमु  जगतीतल  तासु  पितहि  प्रमोदु चरित  सुनी  जासु।।
चारी  पदारथ  करतल  ताके    प्रिय  पितु-मातु  प्राण  सम  जाके।।

इस पृथ्वी तल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनंद हो। जिसको माता पिता प्राणों के सामान प्रिय हैं, चारो पदार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) उसके करतल गत रहते हैं।

उक्त चौपाई की चर्चा करते हुए फादर कामिल बुल्के ने अपने संस्मरण में लिखा है कि पहली बार जब उन्होंने इस चौपाई का जर्मन अनुवाद बेल्जियम में किसी पुस्तक में पढ़ा था तो उन्हें यह कतई  नहीं मालूम था कि इसे कहाँ से उधृत किया गया है। तथापि इस चौपाई से वे इतने प्रभावित हुए कि इसने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने शेष जीवन ईश्वर की भक्ति और मानव की सेवा में बिताने का निर्णय लिया। वो आगे लिखते हैं कि यह ईश्वर की मर्ज़ी थी कि उन्हें यह चौपाई पढने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, संभवतः ईश्वर उन्हें उस रास्ते पर ले जाना चाहता था जो उनकी नियत में लिखा था। नहीं तो कोई वजह नहीं थी कि उन्हें उसी देश में भेजा गया जिस देश के कवि की यह रचना थी। इलाहाबाद में रामकथा पर शोध करते हुए जब कामिल बुल्के को उक्त चौपाई का मूल अवधी स्वरुप अयोध्या काण्ड में पढने को मिला तब उन्होंने इसे ईश्वर की मर्ज़ी मानते हुए भारत को अपना दूसरा घर मान लिया और फिर वे यहीं के होकर रह गए। उन्होंने अपना शेष जीवन श्रीराम को समर्पित कर दिया और भारत को ही अपना कर्मस्थली बना लिया।

रामायण और महाभारत भारत के ऐसे दो महाकाव्य हैं जिसने हर काल और युग में आम जन और बुद्धिजीवियों को समान रूप से प्रभावित किया है। सदियो से इस ग्रंथ की व्याख्या विभिन्न सुधिजन अपने-अपने तरीके से करते आए हैं। हरि अनंत हरि कथा अनंता’ – इस ग्रंथ की  जितनी बार व्याख्या हुई, हर बार ऐसा लगा मानो कुछ अधुरा रह गया हो और फिर इसकी व्याख्या दूसरे विद्वान द्वारा की जाती रही। यही वजह है कि इस ग्रंथ के जितने अनुवाद भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में हुए हैं वो अचंभित करनेवाला है। हर भाषा के विद्वान् ने इस कथा की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की है और हर संस्करण में पढने और समझने को कुछ न कुछ नवीन मिला है। यह रामायण की विशेषता है कि इसने कितनो को कवि और कितनों को ईश्वर की शरण में डाल दिया। बरबस मशहूर विप्लवी कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम की चंद पंक्तियाँ याद हो आती हैं- किस सुदूर अशोक कानन में बंदी तुम सीता,  तुम्हारा मेरा यह असीम विरह लेकर, कितने आदि कवि कितनी रामायणें रचेंगें, कौन जाने प्रिया!  

रामकथा के इसी आकर्षण से बंध मैंने अयोध्या आने का निर्णय ले लिया। श्रीराम का व्यक्तित्व का जादू ने न केवल भारत की एक अरब की जनसँख्या को प्रभावित किया है वरन दक्षिण-पूर्व एशिया के देश यथा, जावा, सुमात्रा, इंडोनेशिया, मलेशिया, मालद्वीप से लेकर यूरोप और अमेरिका तक में श्रीराम पूजनीय हैं। भारत, भारतीय संस्कृति और समाज को समझने के लिए इससे बेहतर और कोई दस्तावेज़ हो ही नहीं सकता। रामायण सदाबहार रचनावली है जिसके प्रति बुद्धिजीवियों का आकर्षण कभी कम होता नहीं दिखता। जिस प्रकार से रामायण की कथावस्तु क्रमवार खुलती है वो बुद्धिजीवियों और आमजन को समान रूप से अभिभूत करता है। फिर चाहे रामायण की प्रस्तुति पुस्तक के रूप में हो रही हो अथवा रामलीला के रूप में, लोग इससे विस्मित हुए बिना नहीं रह पाते। रामायण भारत देश का राष्ट्रीय चरित्र का प्रतिनिधि ग्रन्थ है और यही वजह है इस ग्रन्थ के आंचलिक और प्रादेशिक संस्करण भी उतनी ही संख्या में उपलब्ध हैं जितनी की देश में राज्य और राज्यों की प्रादेशिक भाषा। रामायण की कथा पूरे भारतवर्ष में लोकप्रिय है और इसने पूरे देश को प्रभावित किया है। एक हिन्दू के लिए तो राम से बढ़कर और कोई बेहतर जीवन-दर्शन का उदाहरण तो दे ही नहीं सकता। हिन्दू-धर्म और संस्कृति की इससे समग्र और सही विवेचना किसी और रचना में नहीं मिलती जैसा संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में किया है। संत तुलसीदास के राम में वो सारे गुण विधमान हैं जिसकी लालसा माता-पिता अपने पुत्र में, पत्नी अपने पति में, शिक्षक अपने शिष्य में, भाई अपने भाई में और प्रजा अपनी  राजा में करती है। राम एक आदर्श पुत्र, पति, भाई और राजा के प्रतीक हैं। आज भी वे समस्त भारतवासी के लिए एक अतुलनीय उदाहरण हैं। एक हिन्दू के जन्म से लेकर मृत्यु तक जितने भी महत्वपूर्ण विधि-विधान हैं चाहे वो उपनयन संस्कार हो अथवा विद्या-अर्जन, गृहस्थाश्रम हो अथवा वान्प्रास्थ, हर सुख और दुःख की घडी में राम ही उसका आदर्श, मानसिक संबल और पथ-प्रदर्शक हैं। रामायण तत्पुरुष शब्द है जो "रामा " और "आयन" का संयुक्त अक्षर है। इसका अर्थ है राम की यात्रा। अपनी जीवनयात्रा के क्रम में राम मानो जीवन के सारे रहस्य अपने भक्तों के समक्ष खोल देते हैं ताकि विषम से विषम संकट की घडी में भी एक राम भक्त का हौसला बना रहेऔर उसका सही पथ प्रदर्शन होता रहे। राम की इसी सर्वव्यापकता की चर्चा अनेक लेखकों और कवियों ने की है। निदा फाजली लिखते है: " राम कण-कण में हैं, राम जन-जन में हैं; बचपन की मुस्कराहट में हैं राम, बहन की चूड़ियों की खनखनाहट में हैं राम, माँ के चेहरे की जगमगाहट में हैं राम, खेतों में फसलों की लहलहाट में हैं राम" तात्पर्य यह कि राम सर्वव्यापी हैं और हर उस बंधन से ऊपर हैं जो मनुष्य द्वारा धर्म और जाति के आधार पर बनाये गए हैं। आज भी एक आम हिन्दू संकट के समय अपने राम को याद करता है और उनके जीवन से शिक्षा प्राप्त करता है। राम के चरित्र में देश का चरित्र निहित है। राम का चरित्र देश को एक अलग पहचान प्रदान करता है। राम के चरित्र और कृत से प्रभावित होकर ही महात्मा गाँधी देश में "राम-राज्य" लाने की बात करते थे जो सर्वत्र सुख, शांति, समृद्धि, सहिष्णुता और न्याय का  समग्र मापदंड था। "राम-राज्य" उनकी नज़रों में कल्याणकारी राज्य का सबसे बेहतर उदाहरण था। यही वजह रही होगी कि हमारे संविधान रचयिताओं ने संविधान के खंड तीन जो मौलिक अधिकारों से सम्बंधित था की शुरुआत में राम, सीता और लक्ष्मण के वन गमन के चित्र को अंकित किया ताकि लोगों को रामराज्य की गरिमा का सदा ध्यान रहे और वे अपने सत्य के पथ पर सदा चले जैसा कि श्रीराम ने वन गमन के समय किया था।

इसी सर्वव्यापकता और सार्वभोम  सत्ता के महानायक की भूमि में उनसे साक्षात्कार करने की उत्कंठ लालसा मेरे मन में कई दिनों से थी जो मैं कतिपय रोजमर्रा की झंझटों की वजह से पूरा नहीं कर पा रहा था। फिर सारी लौकिक झंझटों को परे हटाते हुए मैंने अयोध्या आने का निर्णय ले ही लिया। अयोध्या के लिए मैं दिल्ली से कैफियत एक्सप्रेस से रवाना हुआ। कैफियत एक्सप्रेस रोजाना पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से संध्या समय खुलती है और लखनऊ होते हुए अगले दिन प्रातः अयोध्या पहुँचती है। आजमगढ़ तक जाने वाली इस ट्रेन का अयोध्या में दो मिनट के लिए ठहराव है। अपनी बर्थ पर सामान रख मैंने अपनी कमर सीधी की और "कैफियत" शब्द के अर्थ के बारे में सोचने लगा। ट्रेन खुल चुकी थी पर मैं अपने ही विचारों में मगन था जब मेरा ध्यान टीटीई ने तोडा और मुझे टिकट दिखाने को कहा। टीटीई को टिकट दिखाने के क्रम में मेरी नज़र उसके शर्ट पॉकेट पर टके नाम पर गया - "कुर्बान अली"  मुझे लगा "कैफियत" शब्द का अर्थ मुझे टीटीई से मिल सकता है। मैंने तुरंत अपनी जिज्ञासा टीटीई के समक्ष रखा और "कैफियत" शब्द का अर्थ बताने का निवेदन कर डाला। "महोदय, इसका मतलब है नशे अथवा उन्माद की मानसिक अवस्था।" टीटीई द्वारा दिए कैफियत की इस व्याख्या को स्वीकार करते हुए मैं एक नई सोच में डूब गया- टीटीई ने जो अर्थ बताया यदि वो सही था तो फिर ट्रेन का ऐसा नाम रखने का क्या औचित्य रहा होगा। संभवतः श्रीराम की भक्ति की उन्माद में डूबे भक्तों के नशे की बात की जा रही हो। या फिर ट्रेन का नाम मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी जिनका जन्म आजमगढ़ (जो इस ट्रेन का गंतव्य भी था) में हुआ था कि ग़ज़ल संग्रह "कैफियत" पर रखा गया हो। बहरहाल वजह जो भी रही हो दोनों ही सन्दर्भों में ट्रेन का यह नाम उचित था। ट्रेन पूरी तरह भरी हुई थी और सहयात्री के रूप में या तो श्रीराम भक्तों का साथ था या फिर साधू और फकीरों का। लोग अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अयोध्या जा रहे थे।  कुछ यात्री भजन गाने में मशगूल थे तो कुछ गंभीर मुद्रा में किसी गहरी सोच में डूबे हुए। सच कहा गया है कि देश की आत्मा के दर्शन भारतीय रेल के सामान्य डब्बों में ही होते हैं। अपनी परेशानियों को अपने भगवान् की झोली में डाल भारत का आम-आदमी किस प्रकार निश्चिंत होकर अपना जीवन व्यतीत करता है, वो धन ऐश्वर्य के पीछे भागने वाले,बहुधा विभिन्न रोगों से ग्रस्त, जूझते, झुंझलाते संभ्रांत और अमीर तबका को तो सपने में भी मयस्सर नहीं है। 

ट्रेन अयोध्या स्टेशन पर प्रातः नियत समय पर आ लगी। मैं अपने सामान के साथ गेट पर ट्रेन के रुकने का ही इंतज़ार कर रहा था और ट्रेन के रुकते ही मैं झट प्लेटफार्म पर कूद पडा। धार्मिक तौर पर महत्वपूर्ण, पर इस छोटे से स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव दो मिनट के लिए ही होता है। इतने समय में या तो बिना सही कम्पार्टमेंट का पता लगाए ट्रेन में चढ़ा जा सकता है या फिर ट्रेन के रुकते न रुकते कूदकर उतरा जा सकता है। औरतों और बुजुर्गों के लिए तो ये खासा तकलीफदेह है। स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने एक रिक्शा किया और अपने निवास स्थान की ओर चल पडा।

अयोध्या को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यह गलत भी नहीं है। जहां हर शहर में दो चार प्रमुख मंदिर होते हैं वहाँ अयोध्या के घर-घर में मंदिर हैं जहां श्रीराम परिवार के दर्शन किये जा सकते हैं। हर घर के सामने वाले हिस्से में मंदिर का निर्माण अवश्य किया जाता है। घर-घर में स्थापित इन मंदिरों के अलावे अयोध्या में 63 वैष्णव मंदिर, 33 शिव मंदिर और 11 जैन मंदिर भी हैं। मंदिरों के अलावे 33 मस्जिद भी हैं जो भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति के परिचायक हैं।  शहर में सूफी और भक्त संतों का प्रभाव भी स्पष्ट देखा जा सकता है। अयोध्या इस प्रकार भारत का लघु रूप है। वर्षों से हिन्दू-मुस्लिम गंगा-जमुना के दोआब में साथ-साथ रहते आए हैं, पर नब्बे की दशक में इस मित्रता और भाईचारे में भारत के भाग्य विधाताओं की कृपा से जो दरार उत्पन्न हुए उसने न केवल गंगा-जमुनी संस्कृति को तहस नहस किया वरन सामाजिक व्यवस्था को भी तार-तार कर रख दिया। तथापि वक़्त ने मलहम का काम किया है और आज शहर में पुनः अमन और चैन व्याप्त है जो बहुत सुकून देती है। 

अयोध्या का प्रथम वर्णन स्कन्धपुराण में आता है, जहाँ इसे भारत की सात सबसे धार्मिक स्थलों में से एक माना गया है: छ अन्य हैं मथुरा, काशी, पूरी, द्वारका, कांचीपुरम और उज्जैनी(अवंतिका)। स्कन्धपुराण में इसे मछली के आकार का बताया गया है। संभवतः यही वजह है कि आज भी अयोध्या में कई घरों के मुख्यद्वार के ऊपर अर्ध-चंद्राकार आकार में मछली प्रतीक स्वरुप अंकित देखा जा सकता है। स्कन्धपुराण एक ऐसा ऐतिहासिक ग्रन्थ है जिसके विभिन्न श्लोकों में अयोध्या के विभिन्न स्थानों का वर्णन उसकी तात्कालिक महत्ता के साथ वर्णित है। पुराण का काल ईसा पूर्व का माना गया है। संभवतः जब पुराण लिखे जा रहे थे उस काल में अयोध्या उसी स्वरुप में विधमान रही हो जिसका वर्णन स्कन्धपुराण में किया गया है। पुराण, जिन्हें पांचवा वेद माना जाता है, के रचियेता वेदव्यास थे जो द्वापरकालीन युग के थे। श्रीराम इस युग से एक युग पहले यानि त्रेताकालीन युग के माने गए हैं। बहरहाल स्कन्धपुराण में रामकालीन प्राचीन अयोध्या नगरी का विस्तृत विवरण उपलब्ध है जिससे राम और रामजनम भूमि पर प्रामाणिक जानकारी मिल सकती है। यह गहन अनुसन्धान और अन्वेषण का विषय हो सकता है। अथर्ववेद में अयोध्या को भगवान् द्वारा निर्मित शहर बताया गया है, जहाँ का वातावरण स्वर्ग सा शांत और सौम्य है। भागवतपुराण में भी अयोध्या का उल्लेख आता है जहाँ इसे इक्षवाकुभूमि (इक्शावाकू  वंश की भूमि) के नाम से उद्दृत किया गया है। इसे रामपुरी और कौशलपुरी के नाम से भी जाना जाता था।  संस्कृत भाषा में अयोध्या का शाब्दिक अर्थ है- युद्धयानी जिसे युद्ध से नहीं जीता जा सकता। अयोध्या को अवध के नाम से भी जाना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है "-वध" यानि जिसका वध नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार बौद्ध ग्रंथों में इस शहर को साकेत या फिर विनीता के नाम से पुकारा गया है। ध्यान आया कि श्रीकृष्ण के देश को गोकुलधाम कहा गया है तो श्रीराम के देश को साकेतधाम की संज्ञा दी गयी है जो सही भी है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार राजा हरिश्चन्द्र के बाद राजा राम ही अपनी समस्त प्रजा को साकेतधाम (स्वर्ग) साथ ले गए थे। चीनी यात्री फा-यान ने अपनी यात्रा वृतांत में इसे शाची नाम दिया है जबकि टोलेमी ने इसे सोगेदा नाम से पुकारा है। सरयू नदी के दक्षिण तट पर बसा अयोध्या शहर देश के विभिन्न प्रमुख शहरों से रेल और रोड द्वारा अच्छी तरह जुड़ा  है।

अयोध्या उत्तर प्रदेश में अवस्थित हिन्दुओं के तीन प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है- दो अन्य हैं मथुरा और काशी। जहाँ मथुरा का सम्बन्ध श्रीकृष्ण से है वहीं काशी का वास्ता श्रीशिव शंकर से है। प्रमुख समाजवादी श्री राम मनोहर लोहिया के अनुसार "राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वपन हैं। सबका रास्ता अलग अलग है। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है, कृष्ण की उन्मुक्त या सम्पूर्ण व्यक्तित्व में और शिव की असीमित व्यक्तित्व में, लेकिन हर एक पूर्ण है। किसी एक का एक या दूसरे  से कम या अधिक पूर्ण होने का सवाल ही नहीं उठता।"उत्तर प्रदेश का यह सौभाग्य है कि ये तीनों ही तीर्थस्थल इस प्रान्त की सीमा में हैं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के काल पर हम नज़र डाले तो पायेंगें कि जेरूसलम को छोड़ किसी अन्य शहर को इतनी प्रमुखता से समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल में स्थान नहीं मिला है जितना अयोध्या को। यही वजह है कि इन्टरनेट एवं अन्य संचार माध्यमों में जितनी जानकारी अयोध्या के सन्दर्भ में उपलब्ध है वो किसी अन्य शहर के बारे में नहीं। अतः अयोध्या के बारे में कुछ नवीन लिखना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसी चुनौती को स्वीकार करते हुए मैंने अयोध्या आने का निश्चय किया ताकि उस शहर के बारे में निकट से जान सकूं जिसने विगत वर्षों में भारतीय राजनीति को उथल पुथल कर रख दिया है। इच्छा यह भी थी कि श्रीराम की उस पावन भूमि से आत्मसार कर सकूं जो श्रीराम की जनम भूमि होने की वजह से विख्यात है। परन्तु छोटे से अयोध्या स्टेशन को देखकर विस्मय हुआ। लगा ही नहीं कि यह उसी अयोध्या नगरी का रेलवे स्टेशन है जिस शहर से हर हिन्दू किसी न किसी रूप में जुडा है। स्टेशन के मुख्य-द्वार पर श्रीरामसीता की मूर्ति अवश्य लगी है पर इससे शहर की ऐतिहासिकता का अंदाज़ा लगाना असंभव था। उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग का एक छोटा सा काउंटर भी स्टेशन परिसर में है पर इसकी सार्थकता संदेहयुक्त थी क्योंकि वहां कोई अधिकारी बैठा नहीं था, वो भी तब जब शहर श्रावण मेला में श्रद्धालुओं से अटा पडा था। ग्रामीण क्षेत्रों से आये श्रद्धालुओं को संभवतः इस जानकारी काउंटर की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि मैंने देखा कि झुण्ड के झुण्ड ग्रामीण जत्था बना विभिन्न मंदिरों और धार्मिक स्थलों को देखने समझने में यों मशगूल थे मानो उन्हें श्रीराम के अलावे इस दुनिया में किसी और से कोई कोई सरोकार ही नहीं था। मुख्य सड़क से होकर मैं अपने आवास पर आया।   

अयोध्या दर्शन की शुरुआत मैंने सरयू नदी में स्नान करने के साथ करने का निर्णय लिया। घर पर सामान आदि रख मैं सरयू घाट को निकल पड़ा। सरयू को गंगा से भी अधिक पावन माना गया है। किम्वदंती है कि जब सम्राट विक्रमादित्य प्राचीन अयोध्या की तलाश में जगह-जगह भटक रहे थे तब सरयू तट पर उनकी भेंट काले घोड़े पर सवार एक देवपुरुष से हुई। काला परिधान पहना वो देवपुरुष अपने काले घोड़े सहित सरयू में प्रवेश कर गया। परन्तु ये दोनों जब सरयू से बाहर आये तब घोडा और सवार दोनों ही धवल सफ़ेद थे। विक्रमादित्य को बड़ा आश्चर्य हुआ। पूछने पर उस देवपुरुष ने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह तीर्थराज प्रयाग है जो प्रयाग में अपने पाप धोने आये श्रद्धालूओं से की वजह से हुई गन्दगी को धोने सरयू आते हैं। तात्पर्य यह कि पुण्य सलिला सरयू प्रयाग को भी स्वच्छता प्रदान करती है। माना जाता है कि जब भगवान् विष्णु ब्रह्मा से मिले तो उनके नेत्र सजल हो गए जिससे सरयू की उत्पत्ति हुई। चूकि सरयू की उत्पत्ति भगवान् के नेत्रों से हुई अतः इसे गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है क्योंकि गंगा की उत्पत्ति भगवान् की चरणों से हुई है। सावन के इस पावन माह में सरयू पूरे वेग से प्रवाहित हो रही थी। इसमें स्नान करने का आनंद ही अवर्णनीय था। सरयू तट पर कई घाट हैं जिनके नाम रामायण के विभिन्न पात्रों पर हैं- यथा रामघाट, राजघाट, जानकीघाट, लक्षमणघाट, कौशल्याघाट, कैकयीघाट, सुमित्राघाट, बिल्वाहरीघाट, वासुदेवघाट, तुलसीघाट, गुप्तारघाट, सहस्त्रधारा आदि आदि। इनमें से गुप्तार घाट का माहात्म्य सबसे अधिक है क्योंकि माना जाता है कि इसी घाट से श्रीराम ने वैकुण्ठ प्रस्थान हेतु जल समाधि ली थी। इसी तरह सहस्त्रधारा भी महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि श्रीराम के आशीर्वाद से इसी स्थान से समस्त अयोध्यावासी वैकुण्ठ को प्रस्थान किए थे। इन घाटों पर स्नान करते समय आवश्यक सावधानी बरतनी चहिये। बरसात में नदी का वेग प्रबल रहता है और बहने का भय बना रहता है। घाट के किनारे बंदरों का उत्पात भी कुछ कम नहीं होता। यदि अपने कपड़ों और सामानों की यथोचित सुरक्षा न की जाए तो ये इन बंदरों के हवाले हो जाते हैं। अतः जरूरी है कि आप जब स्नान कर रहे हों तो आपका मित्र या परिजन आपके सामानों की सुरक्षा करे और बारी- बारी से स्नान किया जाए। चूकि इन बंदरों को श्रीराम का अनुयायी माना जाता है अतः धर्मालु जन इन्हें चोट या नुक्सान नहीं पहुंचाते हैं।

सरयू घाट पर ही राम की पौड़ी का निर्माण किया गया है जहां संध्या समय सरयू आरती की जाती है। हरिद्वार की गंगा आरती की तर्ज़ पर आयोजित सरयू आरती भारत में नदियों और अन्य जल श्रोतों की महत्ता को इंगित करता है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के समय सरयू आरती रोजाना की जाती है। एक हज़ार आठ दीयों के साथ अस्तगामी सूर्य के सामने सरयू की आरती के समय सारा वातावरण आलोकित हो उठा है। जल पर प्रज्वलित दीये प्रतिबिंबित हो रहे हैं जो एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न कर रहे हैं। माहौल राम मय हो गया है और मनुष्य और प्रकृति की निकटता का एहसास हो रहा है। नदी के किनारे टिमटिमाते आरती के दीये, दूर नदी पर बने पुल पर आते जाते वाहनों की टिमटिमाती बत्तियां और ऊपर अम्बर पर तारों के टिमटिमाने से एक विचित्र समा सा बंध गया है। प्रकृति और मानव के बीच के विलक्षण तारतम्य का अद्वितीय नमूना।

सरयू घाट से अब हम आगे आते हैं। अयोध्या के लगभग सभी प्रमुख मंदिर नदी की घाट से लगे हैं। फिजा में घंटी और नगाड़ों के स्वर गूंज रहे हैं। साथ ही गूँज रहे है भजन और अज़ान के स्वर जो सारे वातावरण को भक्तिमय बना रहा है। घाट के पास विभिन्न मंदिरों के होने से विभिन्न मंदिरों में दर्शन करना सहज हो जाता है।

सबसे पहले मैं नागेश्वरनाथ मंदिर का रुख करता हूँ। नागेश्वरनाथ मंदिर भगवान् शिव का मंदिर है जिसे मूलतः श्रीराम पुत्र राजा कुश ने बनवाया था। कहते हैं कि एक बार राजा कुश जब सरयू घाट पर स्नान कर रहे थे तब उनके हाथ का कंकन फिसल कर नदी में जा गिरा जिसे नागकन्या कुमुदिनी ने ले लिया। बहुत खोजने पर भी जब कंकन नहीं मिला तो कुश ने विचार किया कि हो न हो नागराज ने ही उनका कंकन ले लिया हो। यह विचार आते ही उन्होंने नागराज के संहार का निर्णय ले लिया। उधर नागराज को जब यह बात पता चला तो वो घबडाकर भगवान् शिव की शरण में गया और प्राण की रक्षा की गुहार करने लगा। अंत में भगवान् शिव ने स्वयं प्रकट होकर राजा कुश को उनका कंकन वापस दिलवाया और नागराज को क्षमा करने को कहा। राजा कुश भगवान् शिव के आगे नतमस्तक हो गए और उन्होंने यहाँ पर शिव की पूजा की जहां अब नागेश्वरनाथ मंदिर अवस्थित है। कालान्तर में राजा विक्रमादित्य ने इस मंदिर को खोज निकाला था और इसका पुनरुद्धार करवाया था। मध्यकाल में यह मंदिर जब पुनः जर्जर अवस्था में था तब इसका पुनरुद्धार अट्ठारवीं शताब्दी में नवलराय द्वारा करवाया गया। नवलराय के पूर्वज इटावा के सक्सेना कायस्थ थे जो पेशे से कानूनगो थे। अवध के तात्कालिक नवाब सफ़दरजंग के दरबार में नवलराय को नायब-सूबेदार का पद प्राप्त हुआ। अपनी बुद्धि और कौशल से नवलराय नवाब सफ़दरजंग का विश्वास हासिल करने में कामयाब हुआ और नवाब ने उसे अयोध्या का राजा घोषित कर दिया। 1739-1750 के अपने शासनकाल में नवलराय ने अयोध्या के कई ऐतिहासिक मंदिरों का पुनरुद्धार करवाया जिसमे नागेश्वरनाथ का यह मंदिर भी था। इसी शताब्दी के अंत में इस मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा भी करवाया गया जिसके प्रमाण स्वरुप शिलालेख यहाँ अंकित हैं। 

देवी अहिल्याबाई होलकर ने न केवल नागेश्वरनाथ मंदिर का पुनरुद्धार किया वरन अयोध्या में कई नए मंदिरों और घाटों का निर्माण भी करवाया। साधू और संतों के विश्राम हेतु धर्मशालाओं का निर्माण भी रानी द्वारा करवाया गया। इनमे से प्रमुख हैं श्रीराम मंदिर, श्रीभैरव मंदिर, सिद्धनाथ मंदिर, स्वर्गद्वारी मोहताज खाना और सरयू पर घाट।

नागेश्वरनाथ मंदिर के बगल में ही कालेराम का मंदिर हैं। माना जाता है कि मध्यकाल में जब मुस्लिम शासकों ने अयोध्या पर आक्रमण  किया तब जनम भूमि की मूर्ति को सरयू में प्रवाहित कर दिया गया था ताकि ये मुस्लिम आक्रमणकारी के हाथ न लगें। बाद में इस मूर्ति को सरयू से निकाला गया और कालेराम मंदिर में राजादर्शन सिंह जी और पंडित नरसिंह राव मोघे द्वारा 1748 में प्रतिष्ठित किया गया। यह मूर्ति राम दरबार की है यानि भगवान् राम, देवी सीता, भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ वीर हनुमान एक साथ एक काले शिला पर अंकित है। चूकि मूर्ति काले पत्थर की है अतः इसे कालेराम की संज्ञा दी गयी। कालेराम मंदिर में ही दक्षिणमुखी हनुमान के दर्शन हुए और दर्शन हुए गणपति बाप्पा के जिनकी खासियत है उनकी सूंड जो दक्षिणवर्ती है।

कालेराम मंदिर के ही एक कक्ष में हस्तलिखित प्राचीन हिन्दू ग्रन्थ रखे गए हैं। इन ग्रंथों में 18 पुराण, 4 वेद, 6 शास्त्र वाल्मीकि रचित रामायण, संत तुलसीदास रचित रामचरितमानस, 108 उपनिषद् और 15 करोड़ रामनाम शामिल हैं। ये सारे के सारे ग्रन्थ हस्तलिखित हैं और मंदिर के व्यवस्थापक श्री यशवंत राव देशपांडे के अनुसार इनकी लिखने की तिथि अज्ञात है।

कालेराम मंदिर के बगल में ही त्रेता राम का मंदिर अवस्थित है। मंदिर का पट बंद था। मंदिर के पुजारी ने बताया कि इस मंदिर के पट हिंदी पंचांग के अनुसार केवल एकादशी के दिन खुलते हैं। त्रेता राम के वर्त्तमान मंदिर का निर्माण कुल्लू के राजा द्वारा तीन सौ वर्ष पूर्व करवाया गया था। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कार द्वारा अट्ठारवीं शताब्दी के अंत में किया गया। भगवान् राम त्रेता युग में अवतरित हुए थे। फिर भी उनके नाम पर मूर्ति की स्थापना करना जब कि वे स्वयं साक्षात उपस्थित थे, ने मुझे अचंभित किया। मेरी उत्कंठा का समाधान करते हुए  मंदिर के पुजारी ने स्पष्ट किया कि वनवास से लौटने के बाद  श्रीराम ने जब अश्वमेध यज्ञ करने का निर्णय लिया था तो यह पूजा देवी सीता की अनुपस्थिति में संभव नहीं था। पर श्रीराम ने स्वयं ही देवी सीता को वन में वाल्मीकि आश्रम में निर्वासित कर दिया था। फिर यह रास्ता निकाला गया कि देवी सीता की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित कर पूजा संपन्न किया जा सकता है। बाद में जब यज्ञ के अश्व को लव- कुश ने रोक लिया और सारे महारथी लव-कुश से युद्ध में पराजित हो गए तो श्रीराम को स्वयं युद्ध में उतरना पड़ा। पर यज्ञ स्थल पर भी उनकी उपस्थिति अनिवार्य थी। अतः समाधान यह निकाला गया कि देवी सीता की ही तरह श्रीराम की भी स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना कर दी जाए। इस प्रकार श्रीराम के जीवन काल में ही उनकी स्वर्ण प्रतिमा का निर्माण हुआ और उसे यज्ञ स्थल पर स्थापित कर वे स्वयं युद्ध को अग्रसर हुए, जहां उनका अपने पुत्रों और पत्नी से पुनः मिलन हुआ। आज श्रीराम और देवी सीता की स्वर्ण प्रतिमा तो उपलब्ध नहीं हैं पर इस घटना की स्मृति में इस मंदिर को त्रेता राम का मंदिर कहा जाने लगा क्योंकि अश्वमेध यज्ञ इसी मंदिर प्रांगन में संपन्न हुआ था।

श्रीराम के जीवनकाल को देखे तो हम पायेगें कि उन्होंने दो अवसर पर ऐसे बड़े अनुष्ठान किये। सर्वप्रथम लंका युद्ध के दौरान जब युद्ध उनकी अपेक्षा से अधिक लंबा खीचने लगा तो उन्होंने शक्ति की देवी दुर्गा का आवाहन किया और युद्ध में विजय हेतु आशीर्वाद प्राप्त किया था। श्रीराम शक्ति की पूजा करते हैं - ठीक उसी रूप में जिस रूप में नवरात्र में होती है। शक्ति नवरात्र के अंतिम दिन अर्थात नवमी को राम द्वारा अर्पित किये जाने वाले नौ कमलों में से एक कमल भगवान् शिव छिपा लेते हैं। राम अपनी एक आँख निकालकर अपने कमल नयन देवी को अर्पित करते हैं, जब भगवान् शिव और देवी दुर्गा दोनों ही उपस्थित होकर श्रीराम को विजय का आशीर्वाद देते हैं। इसका वर्णन कवि कृत्तिवासा रचित बांग्ला रामायण में है। बाद में राष्ट्रकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने अपने ग्रन्थ "राम की शक्ति पूजा" में इसका विशद वर्णन किया है। राम की शक्ति पूजा का मूल अभिप्राय यह है कि इस संसार में सफलता के लिए शक्ति आवश्यक है। देवी सीता शक्ति की ही प्रतिरूप हैं। पर भगवान् राम जब देवी सीता की जगह उनकी स्वर्ण प्रतिमा के सहारे अश्वमेध यज्ञ करते हैं तो उसमें नाना प्रकार की बाधाएं आती हैं। और तो और इस बार उनका मुकाबला अपने ही पुत्रों से होता है जिनका पलड़ा भारी है क्योंकि शक्ति की प्रतिरूप देवी सीता श्रीराम के साथ नहीं हैं। वाल्मीकि आश्रम में देवी सीता अपने पुत्रों के साथ है यानि शक्ति लव-कुश के पक्ष में है। राम और उनके पुत्रों के बीच युद्ध ऐन वक़्त पर टल जाता है और श्रीराम का अपने परिवार से पुनर्मिलाप होता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विजय उसे ही प्राप्त होती है जिसे शक्ति की देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त है। बंगाल में देवी पूजा की महत्ता है और कृत्तिवासा द्वारा इस प्रसंग का उल्लेख इस महत्ता को स्थापित करने में सफल होता है।

शक्ति पूजा की बात चली है तो बताते चले कि यहाँ छोटी देवकाली का मंदिर भी दर्शनीय है। हालांकि यह मंदिर छोटा है पर इसका माहात्म्य बहुत अधिक है। कहते हैं देवी सीता जनकपुरी से जब  विदा हुई तो माँ काली की वह मूर्ति साथ लाई जिनकी वो जनकपुरी में नित्य पूजा करती रही थी। अयोध्या आकर इस काली की मूर्ति को छोटी देवकाली मंदिर में स्थापित किया गया। अतः इसे अब छोटी देवकाली मंदिर के नाम से जाना जाता है। छोटी देवकाली की ही तरह बड़ी देवकाली मंदिर का भी वर्णन शास्त्रों में मिलता है। बड़ी देवकाली का मंदिर अयोध्या फैजाबाद मार्ग पर अवस्थित है और यह श्रीराम की कुलदेवी थी। यहाँ माँ काली, माँ सरस्वती और माँ लक्ष्मी की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं।

मैं और आगे बढ़ता हूँ। अब मैं वाल्मीकि मंदिर परिसर में हूँ। वाल्मीकि मंदिर अपनेराम बैंकके लिए विख्यात है। राम बैंक रामभक्तों द्वारा सादे कागज़ पर लिखे सीताराम को जमा लेता है और इन भक्तों को इसकी रसीद भी देता है। हर भक्त के नाम से खाता खुला हुआ है। भक्त अपने लिखे "सीताराम" यहाँ जमा करते हैं और उनके द्वारा अब तक जमा रामनामा की रसीद दी जाती है। सब कुछ बड़े ही व्यवस्थित ढंग से किया जाता है जैसे कि और बैंकों में लोगों की धनराशि जमा ली जाती है वैसे ही राम बैंक मेंरामनामाजमा ली जाती है। इस प्रचलन का उल्लेख  करते हुए महात्मा गाँधी अपनी पत्रिका हरिजन में लिखते हैं कि रामनामा में बहुत शक्ति है बशर्ते राम भक्त ह्रदय से इसे लिखे और इसका पाठ करें। (हरिजन,  13.10.1946)

पास में ही कनक-भवन है।  कनक यानि सोना। स्वर्ण निर्मित यह भवन त्रेता काल में माता कैकेयी ने अपनी प्रिय पुत्र वधु देवी सीता को विवाहोपरांत मुंह दिखाई स्वरुप दी थी। माना जाता है कि द्वापर में जरासंध का संहार करने के बाद श्रीकृष्णा इस भवन में कुछ समय रुके थे। मंदिर में लगे एक शिलालेख के अनुसार रामकालीन कनक-भवन का प्रथम पुनरुद्धार राजा कुश ने द्वापर काल में किया। बाद में राजा विक्रमादित्य ने इसका पुनरुद्धार युधिष्ठिर संवत 2431में किया। कनक-भवन रामकालीन वे पांच मंदिर और भवन हैं जिनका पुनरुद्धार का उल्लेख विक्रमादित्य कालीन इतिहास ग्रंथों में मिलता है- ये हैं श्री जनम भूमि मंदिर जहाँ श्रीराम का जनम हुआ था, रत्न सिंहासन जहाँ श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था, सहस्त्रधारा के समीप लक्षमण शेषनाग मंदिर, बड़ी देवकाली मंदिर जिसे आदि शक्ति मंदिर भी कहा जाता है और कनक-भवन। 444 इसवी में इस मंदिर का पुनरुद्धार गुप्त राजा समुद्रगुप्त द्वारा करवाया गया। सन 1084 इस भवन को सालारजंग द्वारा क्षति पहुंचाई गयी पर बाद में ओरछा की रानी कृष्णा भानु देव कुंवरी द्वारा इसका पुनरुद्धार करवाया गया जो कि भवन का वर्तमान स्वरुप है।  ओरछा की रानी कुँवरी गणेश भगवान् राम की अनन्य भक्त थी और उनहोंने श्रीराम को ओरछा ले जाने की जिद ठान रखी थी। एक दिन सरयू में स्नान करते समय उन्हें श्रीराम की एक मूर्ति मिली। इस मूर्ति को वे ओरछा ले गई जहां उन्होंने श्रीराम की इस मूर्ति का विधिवत राज्याभिषेक कर ओरछा की राजगद्दी सौंप दी और स्वयं एक सन्यासी की तरह जीवनयापन करने लगी। चूकि उन्हें  आराध्य देव श्रीराम अयोध्या में मिले थे, अतः इसी वंश की रानी कृष्णा भानु देव कुंवरी ने कनक-भवन का पुनः निर्माण कर राम-सीता को वहां पुनर्स्थापित किया। कनक-भवन में राम सीता की तीन मूर्तियाँ विधमान हैं जो तीन आकार की हैं। श्रावण माह में इनमें से सबसे बड़ी जोड़ी भवन में ही रहती है। मध्य आकार की दूसरी जोड़ी को मंदिर परिसर में ही झूले पर स्थापित कर झुलनोत्सव होता है। तीसरी जोड़ी को एक झांकी में मणिपर्वत ले जाया जाता है जहाँ भक्तों की अपार उपस्थिति में उन्हें श्रावण झूले में झुलाया जाता है। श्रावण मास में कनक-भवन की सजावट और खूबसूरती देखते ही बनती है। जिस प्रकार रामभक्त विह्वल होकर श्रीराम सीता की झांकी निकालते हैं और उन्हें श्रावण झूले में झुलाते हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान् साक्षात उपस्थित हैं।          

कनक भवन से निकल कर मैं झांकी में राम भक्तों के साथ साथ मणि पर्वत की ओर चलता हूँ। मणिपर्वत वह स्थान है जहां राजा दशरथ ने जनक से मिले दहेज़ की सारी कीमती रत्न, आभूषण, स्वर्ण, आदि रखवा छोड़े थे। राजा जनक ने सीता को विदाई के समय यथोचित धन सम्पदा, सोना, चांदी, रत्न, कीमती पत्थर और आभूषण के साथ विदा किया था। महाराज दशरथ चूकि खुद सुविधा संपन्न थे अतः उन्होंने इस समस्त वस्तुओं को इस स्थान पर रखवाया जिसने पर्वत का रूप अख्तियार कर लिया।रत्न आभूषण और मणिसे बने इस पर्वत को इसलिए मणिपर्वत नाम दिया गया। मणिपर्वत का दृश्य ह्रदय स्पर्शी था। भक्तों का विशाल हुजूम अपने राम सीता की जोड़ी की झलक पाने को व्यग्र था। स्थानीय प्रशासन स्थिति को नियंत्रण में रखने का हर संभव प्रयास कर रहा था। हिन्दू धर्म और आस्था में श्रावण झूले का अलग ही महत्व है। गृहस्थ जीवन की भाग दौड़ में लोग भले अब इन सब विषयों में ज्यादा समय न दे पाते हो पर राम भक्तों का उत्साह यहाँ देखते ही बनता है।हर मंदिर से राम सीता की जोड़ी यहाँ पर आती है और पर्वत पर बने विभिन्न झूले पर इन्हें झुलाया जाता है। फिर इन्हें वापस उनके मंदिरों में ले जाया जाता है।छोटे छोटे बालकों का राम सीता के रूप में श्रृंगार  कर उन्हें राम सीता का रूप मन कर भक्त उन्हें झूले पर झुलाते हैं। 

मणिपर्वत से लौटते हुए मैं हनुमानगढ़ी में रुक जाता हूँ। हनुमानगढ़ी एक टीले पर अवस्थित हनुमान मंदिर है। मंदिर तक जाने के लिए सीढी बने हैं। 76 सीढियां चढ़ मैं हनुमानगढ़ी के मुख्य दरवाज़े पर खड़ा हूँ। सांस धौकनी की तरह चल रही है। सांस को संयत कर मैं मंदिर की मूर्ति को देखने लग जाता हूँ। यहाँ हनुमान अपने पारंपरिक रूप में नहीं हैं। हनुमान की छवि हर भक्त में संजीवनी पर्वत उठाये पवन-पुत्र की मुद्रा की रहती है और यही छवि हनुमान मंदिरों में मूर्तियों में भी दिखती है। किन्तु हनुमानगढ़ी में बाल हनुमान की मूर्ति है जो अपनी माता अंजनी की गोद में बैठे दिखाए गए हैं। कहा जाता है कि वैकुण्ठ जाते हुए, जल समाधि लेने से पूर्व श्रीराम ने अयोध्या की बाग़डोर हनुमान के हाथों में सौंपा था और तब से भक्तगण हनुमान को अयोध्या का राजा मानते आये हैं। यह भी कहा जाता है कि श्रीहनुमान इस टीले से रामकोट पर नज़र रखते हैं और उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं। हनुमानगढ़ी एक गढ़ अथवा किला स्वरुप दिखता है जिसका पुनर्निर्माण नवाब शुजाउद्दौला के शासन काल में स्वामी अभयराम दासजी द्वारा करवाया गया था। वर्तमान गढ़ तीन सौ वर्ष पुराना है। हनुमानगढ़ी का मंदिर परिसर काफी विशाल है जिसमे एक ओर साधुओं का अखाडा है, दूसरी ओर गोशाला है, तीसरी ओर लंगर और चौथे कोने पर रामायणी है जहां रामायण पाठ होता रहता है। इस परिसर में चार मठ महत्व के हैं जिन्हें क्रमश हरिद्वारी, बासतिया, उज्जैनी और तिकैती के नामे से जाना जाता है। इसके अलावे एक संस्कृत विद्यालय भी इस मंदिर परिसर में अवस्थित है। सर्व धर्म समभाव को अभिव्यक्त करता सतयार मंदिर भी इस परिसर में ही है जहां भगवान् राम के अलावे गौतम बुद्ध, वर्धमान महावीर, ज़रथुस्त्र और मक्का-मदीना के चित्र अथवा मूर्ति स्थापित हैं। हिन्दू सहिष्णुता और दयालुता का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है? प्रत्येक वर्ष हनुमान जयंती के दिन इस मंदिर में हनुमान जी का जन्मदिन बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। कार्तिक माह के कृष्णा पक्ष में दीपावली से एक दिन पहले चतुर्दर्शी को हनुमान जयंती के दिन यह मंदिर परिसर रौशन रहता है और हनुमान भक्त रात्रि जागरण कर भजन आदि करते हुए हनुमान के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति प्रदर्शित करते हैं। पहले श्रीहनुमान को तोपों की सलामी भी दी जाती थी जो अब पटाखों तक सीमित रह गया है।    

मठ की उपस्थिति अयोध्या शहर का एक वैशिष्टय है। इन मठों का सञ्चालन साधुओं द्वारा होता है और कई मठ तो काफी प्रभावशाली और समर्थवान हैं। एक समय था जब अयोध्या में गृहस्थों का निवास वर्जित था। उस दौर में अयोध्या में केवल मठ थे और मठों में रहने वाले साधू। प्रमुख मठों में से कुछ के नाम इस प्रकार हैं: मनीराम दासजी की छावनी, श्री रघुनाथ दासजी की छावनी, गोकरन पतंजलि जेवोत्तम मठ, खाकी अखाडा, राम हर्षण कुञ्ज, हरिराम हनुमत सदन, लक्षमण किला, सुग्रीव किला, अशर्फी भवन, गोकुल भवन और लाल कोठी। पहले इन मठों को राजा रजवाड़ों का वरद्हस्त प्राप्त था। राजा रजवाड़ों के जाने से यह संरक्षण जाता रहा और इनमें से कई मठ आज जर्जर अवस्था को प्राप्त हो गए हैं।

मठों की ही तरह अयोध्या में आश्रमों की भी परंपरा रही है। लोमस ऋषि का आश्रम, अगस्त्य आश्रम, पाराशर आश्रम आदि कुछ महत्वपूर्ण आश्रम का वर्णन आदि ग्रंथों में मिलता है जो आज भी विधमान हैं। पर इनमें से सबसे महत्वपूर्ण वशिष्ठ मुनि का आश्रम हैं जहाँ श्रीराम अपने तीनों भाइयों के साथ गुरु वशिष्ठ से शिक्षा अर्जन किये थे। तमसा नदी पर गुरु वाल्मीकि का आश्रम भी है जहां माँ सीता निर्वासन के समय अपने पुत्रों के साथ रही थी। इसी आश्रम में गुरु वाल्मीकि की शिक्षा-दीक्षा में लव-कुश बड़े हुए थे। यहाँ से थोड़ी दूर पर ही प्रख्यात नंदीग्राम अवस्थित है। इसी स्थान पर राजकुमार भरत ने श्रीराम की प्रतीक्षा में चौदह वर्ष बिताये और उनकी अनुपस्थिति में उनकी चरण पादुका के सेवक के रूप में अयोध्या के शासन का सञ्चालन किया था।

अयोध्या में आप जहां कहीं भी चले जाए आपको रामयुगीन स्थानों और नामों के ढांचे नज़र आयेगें जो अब बहुत ही जर्जर अवस्था को प्राप्त हैं। पूरे अयोध्या शहर में रामयुगीन अवशेषों के दर्शन होंगे जो इस बात के मूक गवाह हैं की कभी इस भूमि पर श्रीराम के चरण पड़े थे। आगे राम दुर्ग है जो श्रीराम का किला है। इसी के बगल से आप सीता रसोई की ओर जा सकते हैं। सीता रसोई वह जगह है जहां माना जाता है माँ सीता रसोई बनाती थी। कभी यह सोचे कि माँ सीता साक्षात् लक्ष्मी स्वरूप होकर भी अपने पति के लिए रसोई तैयार करती थी तो आपको रिश्तों की गरिमा का पाठ भी पढने को यहाँ मिल जाएगा। सीता रसोई के बगल में ही सीता कूप है जिस कुएं के जल का प्रयोग सीताजी करती थी। इसी प्रकार आगे अशोक वाटिका है जहां राम सीता संध्या भ्रमण करते थे। और आगे जाए तो सिद्धपीठ के दर्शन होंगे। जानकी महल और इस मंदिर परिसर में अवस्थित राम जानकी मंदिर, हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और गणेश मंदिर, इन  चारों मंदिरों का पुनरुद्धार स्वतंत्रता उपरांत मोहन लाल केजरीवाल द्वारा करवाया गया था।

मुझे इस बात का दुःख और क्षोभ था कि एक पूरा शहर जो राम के कार्य और काल का धरोहर है उसे यों ही टूटने-फूटने और रसातल में जाने कैसे दिया जा सकता है? विभिन्न हिन्दू धर्मशास्त्रों और ग्रंथों में ऐसे कई मंदिरों और स्थानों का वर्णन मिलता है जो अब वास्तव में मौजूद नहीं हैं। संभवतः इन वर्षों में या तो वे टूट-फूट कर इतिहास की गर्भ में समा गए या फिर इन्हें परिवर्तित कर दिया गया। आज भी मध्यकालीन ऐसे कई इमारत, मंदिर और अन्य पूजा स्थल हैं जो जर्जर अवस्था में है। बहुत संभव है कि आने वाले वर्षों में इनका वजूद ही न रहे। पर इससे यह निष्कर्ष कदापि नहीं निकालना चाहिए कि अतीत में इन इमारतों अथवा पूजा स्थलों का वजूद ही नहीं था। इन्टरनेट पर जाए तो आज विकिपीडिया भी इस बात को स्वीकार करता है कि कभी अयोध्या में श्रीराम का राज्य था।

पर मेरा प्रश्न उन सभी देशवासियो से है जो अपने इतिहास, अपनी साझी संस्कृति और आपसी भाईचारे की परंपरा पर गर्व करते हैं। मेरा सवाल न केवल हिन्दू बुद्धिजीवियों से है वरन मुस्लिम बुद्धिजीवियों से भी है कि क्यों नहीं यह समुदाय सामने आता है और श्रीराम की धरोहर को सुरक्षित करने में हाथ बटाता है। एक ओर हम गंगा-जमुनी संस्कृति की चर्चा करते हैं और दूसरी ओर ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों, भवनों और इमारतों के संरक्षण के मसले पर एक मत नहीं हो पाते। यह निश्चय ही हमारी बौद्धिकता निरर्थकता को इंगित करता है। यह हकीकत है कि किसी भी देश की सांस्कृतिक विरासत इतनी वैभवशाली नहीं है जितनी की अपने देश भारत की। पर आज के दौर में यह भी सच है कि किसी भी देश के बुद्धिजीवियों की अकर्मण्यता इतनी प्रबल नहीं है जितनी की अपने देश की। जिस देश के लोग, सन्तति और समाज अपनी विरासत की रक्षा करने में असक्षम है उस देश की स्वतन्त्रता पर आंच आना ही आना है।  

बहरहाल मैं और आगे बढ़ता हूँ। श्रीराम की इस नगरी में घूमते हुए मैं अयोध्या से बाहर निकल चुका हूँ। एक बोर्ड लगा दिखता है जो चौरासी कोसी परिक्रमा का दिशा निर्देश इंगित कर रहा है।अयोध्या अपनी परिक्रमाओं के लिए भी जाना जाता है। परिक्रमा एक निश्चित पैदल पथ है जो धार्मिक महत्व के कुछ मंदिरों के चारो ओर राम भक्तों द्वारा पैदल चलकर पूर्ण किया जाता है। स्कन्धपुराण में इन परिक्रमाओं का उल्लेख मिलता है जहाँ इससे मिलने वाले पुण्य को अश्वमेध यज्ञ के पुण्य से भी बड़ा माना गया है। पांच कोसी परिक्रमा, चौदह कोसी परिक्रमा और चौरासी कोसी परिक्रमा जिनका यात्रा मार्ग क्रमश पांच, चौदह और चौरासी कोस है, ये तीन प्रकार की परिक्रमाओं का विधान है।

अयोध्या भ्रमण के दौरान ही अयोध्या शोध संस्थान में भी जाने का अवसर मिला। अयोध्या शोध संस्थान की स्थापना 1986 में हुई थी। यहीं तुलसी स्मारक भवन भी है। संत तुलसीदास रामचरितमानस लिखने के क्रम में 1631 में अयोध्या पधारे थे और यहाँ तक़रीबन तीन साल का प्रवास किया था। शहर के मुख्य बाज़ार में तुलसी उद्यान इस बात का गवाह है। संत तुलसीदास ने ही रामलीला की परंपरा डाली थी। आज अयोध्या शोध  संस्थान में अनवरत रामलीला का आयोजन किया जाता है।1988 में पहली बार साप्ताहिक रामलीला के मंचन का निर्णय वीर बहादुर सिंह की सरकार ने लिया था जिसे 2004 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बदलकर रोजाना करने का निर्णय लिया। आज तक 200 से अधिक रामलीला मंडलियों द्वारा इस संस्थान के प्रेक्षागृह में रामलीला का मंचन हुआ है। न केवल उत्तर-प्रदेश वरन बिहार, छतीसगढ़, मध्य-प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडू, महारास्ट्र, ओडिशा, असम और कर्नाटक के कलाकारों द्वारा रामलीला का मंचन यहाँ हो चुका है। इन प्रस्तुतियों का सबसे दिलचस्प पहलु यह है कि हर मंडली न केवल अपने आंचलिक परिवेश में मंचन करती है वरन हर मंडली अपने क्षेत्रीय भाषा के रामायण का मंचन करती है। अतः जहाँ दर्शक उत्तर-प्रदेश की अवधी रामलीला का आनंद लेते हैं वहीं बिहार की मिथिला शैली, असम की अंकियानट, उत्तराखंड की कुमायूंनी शैली में रामलीला का मंचन का आनंद भी लेते हैं।  इसी प्रकार बंगाल के कलाकार कृत्तिवासा रामायण का, मराठी कलाकार माधव कन्दली रचित कथा रामायण का, तमिल कलाकार कंबन रामायण का और तेलुगु कलाकार रंगनाथ रामायण का मंचन यहाँ कर चुके हैं।

अयोध्या की भूमि न केवल हिन्दू संस्कृति की संरक्षक रही है वरन इसने सूफी और भक्त संतों को भी प्रश्रय दिया है। जैन और बौद्ध  प्रभाव भी यहाँ स्पष्ट देखे जा सकते हैं। हज़रात शीश की दरगाह अयोध्या में ही है। फिरदौस पंथ के सूफी संत शेख जमाल गुज्जरी भी अयोध्या में ही बसते थे। इसी प्रकार दरगाह नौगाज़ी और पीर नुह अलेही सुलेमान का दरगाह भी अयोध्या में अवस्थित है। इन सूफी और भक्त संतों ने आपसी भाईचारे और सहिष्णुता का वहीं पाठ यहाँ के लोगों को पढ़ाया जो रामायण में वर्णित है। यहीं वजह है कि सारे देश में राम जनम भूमि का दावानल फैलने के बावजूद अयोध्या में धार्मिक सहिष्णुता और एकता बनी रही। इसे श्रीराम की तेज का ही प्रताप माना जा सकता है कि आपसी सौहार्द और भाईचारे का जो सन्देश उहोंने दिया है उसने लोगों को संयम से काम लेने का बल दिया और देश पुनः सामान्य अवस्था की ओर अग्रसारित हुआ। सहिष्णुता और समभाव के जो आदर्श श्रीराम ने सामने रखा है वो हर हिन्दू को सही और गलत की पहचान कराता है।

जैन संप्रदाय के चौबीस तीर्थंकरों में से पांच का जनम स्थान अयोध्या है। ये तीर्थंकर थे- ऋषवदेव, अजिनाथ, अभिनंदनाथ, अनंतनाथ और सुमतिनाथ। माना जाता है कि अयोध्या के ब्रह्मकुंड आकर गुरु नानक देव और गुरु गोविन्द सिंह कुछ समय समाधिस्त रहे थे। श्रीराम का प्रभाव गुरु ग्रन्थ साहब में स्पष्ट दिखता है जिसमे उनका नाम 2500 और हरि का उल्लेख 8000 बार आता है।

अयोध्या की गलियों में घूमता हुआ, मंदिरों में श्रीराम को ढूंढता हुआ एक बात जो मन को विचलित किये हुई थी वो थी यहाँ के मंदिरों, मठों और कुंडों की जर्जर स्थितिके प्रति आकुलता। अधिकतर मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। अंग्रेजों के शासनकाल में तात्कालिक राजाओं द्वारा इन मंदिरों का रखरखाव किया जाता रहा होगा पर आज इनपर न देश के शासक का और न ही धार्मिक संगठनों का ध्यान है। ये धार्मिक संगठन यो तो रामजनम भूमि के लिए मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं पर अपनी विरासत की इन अन्य महत्वपूर्ण निशानियों के संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। इसलिए कभी-कभी महसूस होता है कि राम मंदिर के निर्माण की आड़ में ये संगठन घिनौनी राजनीति कर रहे हैं। उन्हें न अयोध्या की विरासत से मतलब है और न ही यहाँ के लोगों के अमन चैन से। वे केवल अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के उपाय में मशगूल हैं। यदि अपनी विरासत का उन्हें इल्म होता तो ये संगठन आज अयोध्या की इन सारी ऐतिहासिक मंदिरों, मठों, घाटों और कुंडों कायाकल्प कर देते। मन इन मंदिरों की जर्जर अवस्था को देखकर विद्वेलित हो चुका था। मैं अपने प्रश्न के उत्तर की तलाश में घूमता हुआ शहर छोड़ने से पहले एक अंतिम बार सरयू घाट पर आ बैठा था। सरयू आरती का समय हो रहा था। अस्तगामी सूर्य के पीत प्रकाश से पूरा माहौल स्वर्ण सा चमक रहा था। तभी एक वृद्ध महिला बगल में आ कर बैठ गयी।

"क्या तुम्हे आरती देखने नहीं जाना है? यहाँ बैठे क्या सोच रहे हो?" महिला ने बिना परिचय के पुछा।

मैंने भी बिना संकोच अपनी बात उनके सामने रख दी।

"बेटा, अयोध्या के इस क्षरण और दुर्दशा के लिए तुम्हारा चिंतित होना सही है। पर जब इसी अयोध्या में देवी सीता को सुख और शांति नहीं प्राप्त हुई तो फिर यहाँ के लोग कैसे सुखी, संपन्न और समृद्ध रह सकते हैं? बेटा, देवी सीता लक्ष्मी की साक्षात अवतार थी। पर अयोध्या के लोगों ने लक्ष्मी की इस साक्षात अवतार सीता मैय्या को दुःख पहुँचाया था। इसका श्राप तो इन्हें मिलना ही मिलना था। इसलिए तुम दुखी मत हो और जो हो रहा है उसमें अपना मन लगाओ। जाओ सरयू आरती का आनंद लो।" ये कहते हुए वो महिला खुद उठ गयी और भीड़ में जाने कहाँ खो गई पता ही नहीं चला।

सरयू आरती में भाग लेने के बाद मैं वापस अपने आवास पर आया और अपने सामान बाँध स्टेशन की और चला। ट्रेन में अपने बर्थ पर सामान रख ही रहा था जब ध्यान भजन और अजान की मिश्रित आवाज से टूटा। कहीं बापू का प्रिय भजन हो रहा था " रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीताराम"।दूसरी ओर अजान का मीठा स्वर फिजा में गूँज रही थी। मुझे लगा कि जब तक राम-रहीम की जोड़ी सलामत है देश सुरक्षित रहेगा चाहे फिर उन्हें तोड़ने का प्रयास देश के अन्दर से हो अथवा बाहर से। देशवासियों ने इन विपरीत परिस्थितियों का सामना पहले भी सफलता पूर्वक किया है और श्रीराम की कृपा से आगे भी करते रहेंगें। इसी उम्मीद से उत्साहित हो कर मैं खिड़की से बाहर दूर जाते अयोध्या को देखता रहा जब तक वो नज़रों से ओझल न हो गई। बरबस कवि अल्लाहमा इकबाल की चंद पंक्तियाँ याद हो आई- है राम के वजूद पर हिंदोस्ताँ को नाज़, अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द