Sunday, March 22, 2026

1. अयोध्या: तीर्थार्थीयों, सैलानियों, एवं तिजारतियों का अद्भुत संगम

स्टेशन से निकलते ही ई-रिक्शा वाले ने हांक लगाईकहाँ जाना है, साहबकिस होटल में बुकिंग हैमैंने घर का पता बताते हुए वहाँ पहुँचाने का किराया जानना चाहा। जो किराया उसने बताया, वो पहले की अपेक्षा तीन गुना था। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मेरा यह पहली बार अयोध्या आना हो रहा था। मैं बढ़े हुए किराए का कारण जानना चाहता था।

बाबूअब हमें राम-पथ से जाने की मनाही है। परिक्रमा मार्ग वाले लंबे रास्ते से जाना पड़ता है’- रिक्शावाले ने स्पष्ट किया। खैर मैं चल पड़ा।

तुमने कैसे समझा कि मैंने होटल में बुकिंग कर रखा है?  - रिक्शा पर बैठते हुए मैंने अगला प्रश्न किया।

सरआप जिस वंदे-मातरम ट्रेन से आए हैं उससे यहाँ सैलानी ही आते हैं और वे यहाँ आने से पहले बहुधा होटल में ऑनलाइन बूकिंग करके ही आते हैं।‘- उसने स्पष्ट किया।

लोग तो अयोध्या तीर्थाटन के उद्देश्य से ही आते हैं। क्या मैं गलत हूँ?- मैंने उसे उलझाने की कोशिश की।

सरतीर्थाटन करने वाले कैसे यात्रा करते हैं उन्हें आप स्टेशन के बाहर पेड़ के छाए में बैठे देख ही चुके हैं। ये लोग लोकल और पैसेंजर ट्रेन में मौसम की धूपबारिश और ठंड सहते हुए प्रभु श्री राम के दर्शन हेतु आते हैं। इन्हें अपनी सुविधाओं का ख्याल नहीं रहता। सुदूर गाँव से ये साल के तीन महत्वपूर्ण अवसर पर अयोध्या नागरी अवश्य पधारते हैं- चैत्र में राम-नवमीसावन में मणि-पर्वत मेला के समय और कार्तिक में। ये ही असली तीर्थार्थी हैं। शेष अन्य शहरों से आनेवाले सैलानी हैं जिन्हें श्रीरामजन्मभूमि मंदिर देखने की उत्कंठा रहती है। वे ऊंचे दाम वाले होटल में ठहरते हैं और एक दो दिन रुक कर दर्शन कर वापस लौट आते हैं।‘- रिक्शा वाले ने स्पष्ट किया।

और कौन आते हैं अयोध्या नागरी में?’—मैंने उसे कूदेरते हुए पूछा।

‘इन दिनों एक तीसरा वर्ग का रुख भी अयोध्या की ओर हुआ है। ये तिजारतियों का वर्ग है। इनके लिए अयोध्या व्यापार बढ़ाने का जरिया है। ये अयोध्या में भूमि खरीद रहे हैं। इनसे लोकोपकार की अपेक्षा करने का कोई मतलब नहीं है। पहले के जमाने के अमीर साहूकार और जमींदार वर्ग अयोध्या में कितने ही धर्मशाला स्थापित किए ताकि यहाँ आने वाले श्रद्ध।लुओं को किसी प्रकार की किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े। पूर्व का यह वर्ग खानदानी साधन-सम्पन्न था जो अपने हिस्से की कमाई का एक हिस्सा धर्म के कार्यों में लगाते थे- आश्रमों को दान देनाधर्मशाला स्थापित करनाकुएं खुदवानाबावड़ी खुदवाना आदि आदि। किन्तु आज का साधन-सम्पन्न वर्ग तिजारती हो गया है और उनका मकसद अयोध्या में ज़मीन खरीद कर इसके मूल्यों में बढ़ोतरी का इंतज़ार करना मात्र है। ये अयोध्या में अपने व्यापार के विस्तार के लिए आते हैं।’- रिक्शा वाले ने स्पष्ट किया । इत्तेफाकन आज के समाचार पत्र में एक समाचार पर नज़र चली गयी जो उस रिक्शा वाले की बातों का मर्म बताती प्रतीत हुई।    

बात कुछ आगे बढ़ती तब तक मेरा गंतव्य आ गया था। मैंने किराया चुकाया और घर में आ गया।