| पारसनाथ सम्मेद शिखरजी के दुर्गम रास्ते पर जलावन के लिए तेहणीयन लेकर जाती आदिवासी महिलाएं |
| पारसनाथ की पहाड़ियाँ |
| सीता-नाला में जड़ी-बूटियाँ बेचती आदिवासी महिला |
| शिखरीजी की ओर जाता पथ |
| पारसनाथ का एक विहंगम दृश्य |
| कालिकुंड में जैन मंदिर |
| जल मंदिर |
| पार्श्वनाथ की चोटी से मधुबन का विहंगम दृश्य |
| जैन श्रद्धालु को पार्श्वनाथ के दर्शन कराने ले जाते आदिवासी युवक |
मरंग बुरु का पुजा स्थल- यह संथाल आदिवासियों का देवता हैं
| सम्मेद शिखर्जी पर भगवान पार्श्वनाथ का समाधिस्थल |
पारसनाथ- निर्वाण भूमि श्री सम्मेद शिखरजी सिद्ध क्षेत्र
राजेश सहाय
('स्कोलास्टिक वर्ल्ड', जमशेदपुर एवं 'लाक्षा', रांची पत्रिका में प्रकाशित)
नई-दिल्ली कोलकाता रेल-खण्ड पर ट्रेन गया से ज्यों ही खुलती है, लगता है आप
एक दूसरी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। गंगा के मैदानी इलाके का यहाँ अंत हो जाता
है और झारखंड अपनी समस्त प्राकृतिक तोहफों के साथ पर्यटकों को मानो आमंत्रित करता
प्रतीत होता है। सदा हरे-भरे रहने वाले घने जंगल और ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ और उनसे कल कल बहता झरने का निर्झर जल एक असीम सुकून और
शांति का एहसास देता है। मासूम,
गरीब आदिवासियों से आबाद यह राज्य अपनी प्राकृतिक मासूमियत के अंदर असीम खनिज
संपदा छिपाये है। इन दोनों का ही यहाँ वर्षों से शोषण और दोहन होता आया है- पहले
दिखुओं द्वारा और सन 2000 में झारखंड बनने के बाद अपने ही
भाई बन्धुओं द्वारा। इन्हीं प्राकृतिक वादियों का आनद लेता मैं अपने गंतव्य
पारसनाथ कब पहुंच गया पता भी नहीं चला।
गया
से करीब 170 किलोमीटर और धनबाद से 60 किलोमीटर पर रेलवे के
ग्रांड कॉर्ड पर अवस्थित पारसनाथ जैन धर्मावलंबियों का एक महत्वपूर्ण तीर्थ है। पारसनाथ
रेलवे स्टेशन वस्तूत: ईसरी बाज़ार में है और यहाँ से सम्मेद शिखरजी जहाँ 20 जैन तीर्थंकर समाधिस्थ है करीब 23 किलोमीटर है। ईसरी
बेज़ार से मधुबन तक की सीधी दूरी हालाकि 10 किलोमीटर से अधिक
की नहीं है परंतु घने जंगलों और पहाड़ियों के वजह से
घूम कर रास्ता निकाला गया है जिसकी वजह से यह दूरी तकरीबन 23
किलोमीटर हो जाती है। दूर से ही पार्श्वनाथ टोंक तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को
अपनी ओर आकर्षित करता नज़र आता है। चंद यात्रियों के साथ पारसनाथ रेलवे स्टेशन से
बाहर आता हूँ। कतिपय यात्री ही मधुबन जाने वाले हैं। शेष यहीं ईसरी बेज़ार में
अपने काम से रुक गये हैं। एक टैक्सी वाले से बात करता हूँ। पता चलता है कि पारसनाथ
की पहाड़ियों पर जैन तीर्थंकर की समाधि के दर्शन के लिये श्रद्धालुगण प्रातः 3-4 बजे ही निकल पड़ते हैं। इस हिसाब से मैं करीब 3-4 घंटे विलंब से पारसनाथ
पहुंचा हूँ। तथापि हिम्मत ना हारते हुए मैं आज ही पहाड़ी पर चढ़ने का निश्चय कर एक
टैक्सी में अन्य यात्रियों के साथ मधुबन की ओर निकल पड़ता हूँ। करीब 7 बजे मैं
मधुबन में पारसनाथ पहाड़ी की आधार बिन्दु पर खड़ा हूँ। टैक्सी के सह-यात्री छंट
गये हैं। दो ही अन्य यात्री को मैं अपनी श्रेणी में पाता हूँ जो मेरी तरह आज ही
पहाड़ी चढ़ने को तैयार हैं। ये दोनो ही बंगाल से आये
हुए हैं। एक शिला पर यात्रियों को हिम्मत बंधाता एक कवि की चंद पंक्तियाँ उकेरी
गयी है और साथ भी यह सूचना भी कि शिखर तक की दूरी करीब 14 किलो
मीटर की है। शिखरजी पर्वत चोटी 1350 मीटर ( 4,430 फीट) है। पर्वत की तलहटी, जिसे
मधुबन कहते हैं, में कईं धर्मशालायें और होटल खुल गये हैं
जहाँ पर्यटक रात्रि विश्राम कर सकते हैं। यहाँ वे सभी सुविधायें उपलब्ध हैं जो
किसी भी छोटे शहर मे अपेक्षा की जा सकती है।खैर आपस में बात-चीत करते हुए हम
पहाड़ी चढ़ना शुरू करते हैं। दूर एक पर्वत शिखर पर अलग-थलग एक मंदिर नज़र आता है।
मालूम नहीं यह कौन सा मंदिर है। अन्य मंदिरों से यह मंदिर अलग है। और सभी मंदिर एक
झुण्ड में अन्य तीन या चार पर्वत शिखर पर पास-पास अवस्थित
दिखते हैं। सह-यात्री से पता चलता है कि यह अलग अवस्थित
मंदिर ही पार्श्वनाथ का टोंक है। मैं यकीन नहीं कर पाता क्योंकि यह काफी ऊँचाई पर
अवस्थित है- अन्य मंदिरों से भी काफी ऊंचे पर। खैर सह-यात्रियों से बात चीत करते
हुए मैं धार्मिक पर्वत यात्रा शुरू करता हूँ। घने जंगलों के बीच अब पार्श्वनाथ का
टोंक छिप गया है और कभी-कभी ही नज़र आता है। लगता है बस कुछ ही दूरी पर है।
इन्ही टेढ़े मेढ़े रास्ते पर चलते
हुए एक घंटे में हम कालिकुंड पहुँचते हैं। कालिकुंड से थोड़ा पहले आदिवासियों का
माझीथान है जहाँ मारंग बुरू दिशुम के पूजा आदिवासी जन करते हैं। कालिकुंड में 24 तीर्थंकारों की स्मृति में मंदिर बने हुए हैं। जो यात्री आगे
की यात्रा करने में अपने को असक्षम पाते हैं वे यहाँ से दर्शन कर
वापस जा सकते हैं। मेरे साथ के दोनो बंगाली महानुभाव इतने अधिक थक गये हैं कि वे
यहाँ लम्बा विश्राम का निर्णय कर रुक जाते हैं। मैं बोतल से पानी निकाल कर पीता
हूँ और एक साधु की दी हुई लाठी लेकर आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ। "बेटा
आगे बंदर बहुत हैं और बिना लाठी लिये चलना श्रेयष्कर नहीं है"- साधु की इस
हिदायत पर मैं उन्हें धन्यवाद दे, उनसे लाठी ले आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ-
अकेले ही शेष 11 किलो मीटर की यात्रा पर। ऐसे भी यहाँ
मान्यता है कि पहाड़ की तलहटी पर मधुबन में अवस्थित भूमियाजी मंदिर में सर नवा कर
जो तीर्थ यात्री इस यात्रा पर निकलता है वो कभी नहीं भटकता और यदि गाहे बगाहे भटक
भी गया तो रास्ते में कहीं से कुत्ते प्रकट होते हैं जो यात्री को सही राह दिखा
गायब हो जाते हैं। भूमियाजी पर इसी परम विश्वास के साथ में आगे की यात्रा पर चल
पड़ा हूँ। यूं भी बीच-बीच में पड़ने वाले छिटपुट गाव और इनमें बसने वाले आदिवासी आपको
अकेलेपन का अहसास नहीं होने देंगें। जरूरत पड़ने पर झरने का शीतल जल जो किसी भी
मिनरल वॉटर को मात कर दे, जाने कहाँ से लाकर आपकी प्यास मिटा दे, आप कह नहीं
सकते। प्रकृति और प्रकृति के बीच बसे इन आदिवासियों के सानिध्य में मैं कब अगले दो
घंटे चल गया पता भी नहीं चला और सीता नाला आ गया जो कि कुल यात्रा के आधे रास्ते
पड़ता है। यहाँ से दो मार्ग हो जाते हैं। यहाँ पर इक्का
दुक्का दुकान है जो चाय-नास्ता का प्रबंध रखते हैं। जैन संगठन का एक सराय भी है। श्वेतांबर
जैन संगठन के वलसाड (गुजरात) निवासी किसी सेठ श्री सुन्दरलाल रैचंद जी शाह द्वारा
निर्मित इस सराय में सभी तीर्थयात्रियों के लिये चाय नाश्ते और शर्बत का मुफ्त
प्रबंध हैं।
मैं चाय पी कर तरोताज़ा होता हूँ
और आगे की मार्ग के बारे में पूछता हूँ। पता चलता है दोनो ही मार्ग से शिखरजी पहुंचा
जा सकता है। दाहिने हाथ का रास्ता अधिक चढ़ाई वाला है और पहले पार्श्वनाथ को जाता
है फिर अन्य मन्दिरो को जब कि बायें हाथ का रास्ता गौतम स्वामी टोंक की ओर जाता है
और फिर वहां से पार्श्वनाथ टोंक को जाया जा सकता है। मैं दाहिने हाथ का रास्ता
चुनता हूँ- पहले पार्श्वनाथ के दर्शन करने के लिये और साथ ही साथ यह सोच कर कि फिर
बाद का सफर थोड़ा आरामदायक होगा। इसी सीता-नाला पर गरीब आदिवसियो को जंगली जड़ी
बूटी बेचते देखता हूँ। वास्तव में इन जड़ी बूटियों के बारे में इनका ज्ञान और इनके
प्रत्यक्ष लाभ अद्भुत हैं। मैं घुटने के दर्द और अध-कपाड़ी
(आधे सर में दर्द) की दो जड़ी बूटी लेता हूँ जो वापस घर आकर
इस्तेमाल करने पर काफी कारगार साबित हुए। करीब आधे घंटे के आराम के बाद में पुनः
अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़ता हूँ। अभी भी 7 किलो मीटर
का सफर तय करना बाकी है। 10.30 बज चुके हैं- यानी अभी भी
शिखर जी पहुंचने में 2-3 घंटे लगने हैं। दाहिने हाथ के
रास्ते मैं पुनः अकेला ही चल पड़ता हूँ। किन्तु इस बार बीच-बीच
में पड़ने वाले छिटपुट गाव नदारद हैं और ना ही बीच-बीच में गुजरने वाले तीर्थयात्री।
चाय-नाश्ता बेचने वाले ढाबे तो बिल्कुल ही गायब हो गये हैं। मैं यह सोचकर कि आगे
भी ढाबे आदि मिलते रहेंगें ना तो पानी के बोतल को भरा और ना ही कोई फल अथवा जूस लेकर रखा था। एकदम सुनसान बियावान जंगल में अकेले चलने का रोमांच बचपन की यादों को
ताज़ा कर रहा था। बरबस बचपन के वे दिन याद आ गये जब हम पिताजी के साथ अभ्रक खान
जाया करते थे और कोडरमा संरक्षित वन में इसी प्रकार बेधड़क घुमा करते थे। लगा मानो
बचपन वापस लौट आया है। शिशिर ऋतु में महुआ की खुश्बू
फ़िज़ा में फैली है और बियावान जंगल सर्वत्र पलाश के लाल फूलों से मानो शृंगार
किये हुए है। एक कवि की लिखी कुछ पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं "जेखाने
मुहुआरार मताल गंधे मतवारा होए, आर पलाश रंगे मेखके देहमन शुध कोरे आमि पहुँचोलम
अभीष्टो (ठकुरेर) स्थाने।“ मैं भी महुआ की सुगंध और पलाश के रंग में रंगा आगे
बढ़ता जाता हूँ। अगले चार- पांच किलो मीटर की सीधी चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते दम फूलने
लगा। प्यास से गला सूखने लगा। जनवरी (28) के माह में भी मैं
पसीने से लथपथ हुआ जा रहा था। आसमान पर छाए चंद बादल की छा भी कोई सुकून पहुंचने
में विफल थी। सामने ही शिखरजी दिख रहा था और उससे एक किलोमीटर पहले पड़ने वाला संत
निवास भी। लगा वापस सीता नाला लौट जाउ। सीढियों से उतरना सीढियों पर चढ़ने के
बनिस्बत आसान लगा। पर यह सोचकर कि पांच किलोमीटर चलने के बाद दिन के एक बजे यदि
वापस लौटा तो फिर शिखरजी पर फिर पहुंचना संभव नहीं होगा, मैं
आगे बढ़ता रहा। अगले मोड पर मैं जैसे ही मुड़ा मुझे सामने ही एक आदिवासी नज़र आया।
अपने जीवन में किसी मनुष्य को देख मैं कभी इतना खुश नहीं हुआ हूँगा जितनी खुशी उस
अनजान आदिवासी को देख कर हुआ। उस आदिवासी ने ना केवल मेरी प्यास बुझाये वरन मीठे
पपीते भी खाने को दिये जिससे मुझे नई स्फूर्ति और ताजगी मिली और शेष चढ़ाई चढ़ने
का हौसला और हिम्मत भी। उस दिन संकट की घड़ी में उस आदिवासी में ही मुझे पार्श्वनाथ
के दर्शन हुए। लगा मानो आदिवासी के भेष में स्वयं ईक्षवाकू राजा श्रीराम के वंशज महर्षि
पार्श्वनाथ ही मेरी रक्षा को उस वियावान वन में प्रस्तूत हुए हो। अंततः करीब डेढ़
बजे मैं पार्श्वनाथ के टोंक पर उनकी समाधि के समक्ष अपना सर झुकाये खड़ा था।
जैन मत के अनुसार पार्श्वनाथ ईक्षवाकू
राजा अश्वसेना और रानी वामा के पुत्र थे। वस्तूत: 24 में से 22 तीर्थंकरों ईक्षावाकू वंश से हैं,
20वे तीर्थंकर मुनिव्रत स्वामी एवं 22वे
तीर्थंकर नेमिनाथ को छोड़ कर। पार्श्वनाथ का काल 877 ईसा
पूर्व से 777 ईसा पूर्व का रहा। 30
वर्ष की आयु में इन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। जैन धर्म के 24 तीर्थंकारों में इनका क्रम 23वा है। महावीर स्वामी का प्रादुर्भाव इनके
बाद ही हुआ था। जैन तीर्थंकरों में ये सबसे लोकप्रिय हुए और इनके नाम पर इन पर्वत
श्रेणियों को पारसनाथ की पहाड़ियों से जाना जाता है। पार्श्वनाथ टोंक पर तीर्थंकर
की समाधि पर मैने गरीब आदिवासियों को उसी श्रद्धा से पूजा अर्चना करते पाया जैसा
अहमदाबाद, मुम्बई अथवा सुदूर शहरों से आये अमीर जैन सेठों
को। यह वास्तव में ही सुखद था। पार्श्वनाथ टोंक से मैं गौतम स्वामी टोंक की ओर चला
जो इस टोंक से करीब दो किलोमीटर पर दूसरी पहाड़ी पर है। यहीं से एक रास्ता
तीर्थंकर चन्द्रप्रभु टोंक की ओर जाता है और दूसरा रास्ता जल मंदिर को। इसके
अलावे इन्हें पहाड़ियों पर अन्य तीर्थंकर यथा अजितनाथ, संभवनाथ,
अभिनंदन नाथ, सुमतिनाथ, पद्मा
प्रभा, सुपार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभा,
सुविधीनाथ, शीतलनाथ, श्रेयंश्नाथ,
विमलनाथ, अनंतनाथ, धर्मनाथ,
शान्तिनाथ, कुन्थुनाथ, अरनाथ,
मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नेमिनाथ
के भी टोंक हैं, जहाँ इन सभी तीर्थंकरों ने सिद्धि और मोक्ष
की प्राप्ति की। इनमें से कई ने तो
कयोत्सर्ग अवस्था (खड़े अवस्था में) सिद्ध हुए और मोक्ष प्राप्त किये। प्रत्येक
टोंक पर सम्बद्ध तीर्थंकर के बारे सारी जानकारी दी हुई है- यथा इनके नाम, इनका जीवन काल, इनके माता पिता और वंश का नाम ,
इनके प्रतिनिधि वृक्ष और प्राणी और इनकी आयु इत्यादि। श्रद्धालुजन
प्रत्येक टोंक पर प्रसाद चढा, मथा टेक आगे बढते जाते हैं।
मैं वापसी यात्रा पर चल पड़ता हूँ। सूरज अब अस्ताचल की ओर अग्रसर था और मेरा लक्ष्य जल्दी से जल्दी तलहटी तक पहुचना था। निश्चय ही इन महर्षियों के अदम्य साहस और साधना सामर्थ्य से मैं अभिभूत था जिसके बल पर वे दो हज़ार साल पहले इन पहाड़ियों पर तपस्या को आये थे। किन्तु लौटते हुए जिस बात ने मुझे उध्द्वेलित कर रखा था वो था इस क्षेत्र का राज्य सरकार द्वारा की जा रही उपेक्षा- पर्वत चढ़ने के क्रम में जो भी सुविधायें यहाँ दिखी वो श्वेतांबर और दिगंबर जैन सम्प्रदाय के गुजरात अवस्थित संगठनों द्वारा की गयी है और नहीं तो किसी हद तक कुछ स्थानीय जैन संगठनों द्वारा। सरकार का योगदान शून्य प्रायः: था। संध्या पांच बजे मैं तलहटी मधुबन पहुंचने में सफल होता हूँ। तलहटी पर केन्द्रीय सुरक्षा बल की पलटन की भीड़ देख मैं अचंभित हूँ। पता चलता है कि कल ही नक्सलियों ने कुछ सरकारी अधिकारियों को अगवा कर लिया है और ये नक्सली पीरटांड में पारसनाथ की इन्हीं पहाड़ियों में कहीं छिपे हैं, जिनकी खोज हेतु कॉम्बिंग ऑपरेशन होने वाला है। अहिंसा के पावन भूमि में हिंसा का यह तांडव, गरीब आदिवासियों की बेबसी और इन सब के बीच सरकार की उदासीनता- मैं अपनी जन्म भूमि झारखंड की भाग्यहीनता पर आंसू बहाने के अलावा कुछ भी करने में अपने को बेबस पाता हूँ। एक बार मुड कर पुनः शिखरजी को प्रणाम करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि पार्श्वनाथ सरकार और सरकार के बाहर भटके हुए जन को सद्बुद्धि दे ताकि हमारा प्यारा झारखंड प्रगति की राह पर अग्रसर हो सके।