Saturday, July 4, 2020

बुद्धं शरणम गच्छामि: महाबोधि मंदिर की यात्रा

विश्व-प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर 
वज्रासन बोधि वृक्ष 


अनिमेष लोचन स्थल 

चक्रमन हल 

अजपाल निगरोध वृक्ष 

मुचिलिन्द सरोवर 

राजयत्न वृक्ष स्थल 

गौतम बुद्ध की प्रतिमा 

घी दीया

गौतम बुद्ध की प्रतिमा 
राजगृह के पांडव वन से मैं संध्या समय गया के लिये रवाना हुआ। तीन घंटे की यात्रा के बाद मैं गया में था। दूसरे दिन सुबह मैं बोधगया को निकला। टूटे-फूटे रास्ते में हिचकोले लेता ऑटो को पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय करने में ही एक घंटे से अधिक का समय लग गया। इन्हीं सड़कों पर कभी राजकुमार सिद्धार्थ के चरण भी पड़े होंगें- मैं अपनी सोच में डूबा हुआ था। कपिलवस्तु से राजगृह के पांडव वन और अंततः बोधगया में आकर राजकुमार सिद्धार्थ को उर्वला ग्राम में निरंजना नदी के तट पर वो सुकून और शांति मिली जो उनके दिव्य ज्ञान की प्राप्ति में सहायक सिद्ध हुआ। रोहिणी नदी के जल बंटवारे को लेकर शाक्य और कोलिय क्षत्रीय में उठे विवाद से खिन्न होकर राजकुमार सिद्धार्थ कभी अपना परिवार, पत्नी, पुत्र और राज त्याग शांति की तलाश में निकल आये थे। वे ना तो कोलिय और ना ही शाक्य का पक्ष ले सकते थे क्योंकि माता की ओर से वे कोलिय थे जब की पिता की ओर से शाक्य कुमार थे।

बोधगया में आकर्षण का मुख्य केन्द्र निश्चय ही महाबोधि मंदिर और इस मंदिर प्रांगण में अवस्थित महाबोधि वृक्ष है। यह वही पीपल वृक्ष है जिसके तले राजकुमार सिद्धार्थ को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। उर्वला ग्राम में राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने पांच मित्रों के साथ छ्ह वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। तपस्या के क्रम में राजकुमार सिद्धार्थ ने अन्न-जल तक त्याग दिया। उनके साथी संत कौण्डिन्य, अश्वजीत, महनाम, भद्रिक और वप्प एक-एक कर उन्हें छोड़कर चले गये। कठिन तपस्या से राजकुमार सिद्धार्थ का शरीर कंकाल का ढांचा मात्र रह गया था। एक समय स्थिति ऐसी हो गयी जब उन्हें प्रतीत हुआ कि कहीं इस कठिन तप में उनके प्राण ना उत्सर्ग हो जाये। सिद्धार्थ की समझ में यह आया कि कठिन तप द्वारा शरीर को कष्ट पहुंचाने से बहुधा मानव मन अध्यात्म से विरक्त हो शारारिक कष्ट पर केन्द्रित हो जाता है। अतः सिद्धार्थ तपस्या भंग कर निरंजना नदी के तट पर आये और वहां स्थित शीतल और पावन वातावरण से विभूषित पीपल वृक्ष के नीचे कुश की चटाई पर बैठकर ध्यानस्थ हो गए। उन्होंने शारीरिक उत्पीड़न का मार्ग छोड़कर मन की साधना आरंभ कर दी। पीपल वृक्ष के नीचे जटा-जूटधारी देव-तुल्य सिद्धार्थ का शरीर बड़ा आकर्षक हो गया। नदी के तट पर सेनानी नामक गृहस्थ रहता था जिसकी पुत्री सुजाता ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने पर संकल्प स्वरूप पीपल देव को खीर भेंट करने का निश्चय कर रखा था। सिद्धार्थ को पीपल देव के तुल्य मानते हुए सुजाता ने यह खीर राजकुमार सिद्धार्थ को समर्पित किया। सिद्धार्थ ने खीर का रसास्वादन किया और फिर निरंजना नदी का स्वच्छ जल पी जिससे उनमें नये जीवन का संचार हुआ। इसके उपरांत राजकुमार सिद्धार्थ पुनः ध्यान मग्न हो गये। दूसरे दिन प्रातः उन्हें दिव्य-ज्ञान हुआ। साथ ही उन्हें सम्यक संबोधि की प्राप्ति हुई। राजकुमार सिद्धार्थ को दिव्य-ज्ञान हुआ कि जगत में व्याप्त दुखों का कारण क्या है और उसके निवारण का मार्ग क्या है। दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के उपरांत ही राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कहलाये। चूंकि इन्हें सत्‍य का ज्ञान हो गया था, अतः इन्हें तथागत भी कहते हैं।  चूंकि ये साख्य वंश के राजकुमार थे, अतः इन्हें साख्य मुनि के नाम से भी संबोधित करते हैं। दिव्य-ज्ञान की प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध इस ज्ञान को सबसे पहले अपने पांच संत मित्रों के साथ बांटने को उद्यत हुए। पर पहले गौतम बुद्ध ने इस ज्ञान को और समग्र एवं मानव जाति के लिये इसकी उपादेयता को और उन्नत करने के लिये सात सप्ताह तक इस ज्ञान का चिंतन मनन किया। इन सात सप्ताह में वे वर्तमान महाबोधि मंदिर परिसर में सात स्थलों पर ध्यान मग्न रहे। मंदिर परिसर में अवस्थित ये सातो स्थान आज भी बौद्धों के लिये परम पूजनीय और पावन स्थल हैं।

महबोधी मन्दिर के इन सात पावन स्थलों के दर्शन करना हर यात्री के लिये आवश्यक है। मैने भी इन सातो स्थलों के दर्शन उसी क्रम में लेने का निश्चय किया जिस क्रम में कभी गौतम बुद्ध ने इन स्थलों पर अलग-अलग एक-एक सप्ताह गुजारे थे।

सबसे पहले वज्रासन के दर्शन करता हूँ। वज्रासन वह आसन है जहां राजकुमार सिद्धार्थ को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वज्रासन महबोधि मन्दिर और महबोधि पीपल वृक्ष के बीच अवस्थित है। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में वज्रासन का निर्माण चक्रवर्ती सम्राट अशोक द्वारा कराया गया था। लाल पत्थर से बना वज्रासन तीन फीट ऊंचा आसन है जिसकी लम्बाई साढे साथ फीट और चौडाई साढे चार फीट के लगभग है। वज्रासन के पास खडा हो मैं उसी अनुभूति को महसूस करने का प्रयास करता हूँ जब राजकुमार सिद्धार्थ को दिव्य-ज्ञान प्राप्त हुआ था।

यहां से मैं अनिमेष लोचन चैत्य आता हूँ जहां दूसरे सप्ताह गौतम बुद्ध अपलक दृष्टि से बोधि वृक्ष की ओर ध्यानरत रहे थे। चुकि इस पूरे सप्ताह गौतम बुद्ध ने अपने पलक नहीं झपकाये अतः इस स्थान को अनिमेष लोचन कहा जाता है। 

तीसरा सप्ताह गौतम बुद्ध ने चक्रमन स्थल पर गुजारे थे। यह वर्तमान महबोधि मन्दिर की उत्तर दिशा में अवस्थित एक गलियारा है जहाँ एक सप्ताह तक लगातार चलते हुए गौतम बुद्ध ने अपना ध्यान बोधिवृक्ष पर केन्द्रित रखा और प्राप्त ज्ञान पर चिंतन रत रहे। आज इस स्थान पर एक मंच का निर्माण कर दिया गया है जहाँ बौद्ध श्रद्धालुओं को पूजा-पाठ करते देखा जा सकता है।

चक्रमण के उत्तर पश्चिम में रत्न घर अवस्थित है। यह एक बिना छत का मंदिरनुमा ढांचा है। दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद चौथा  सप्ताह गौतम बुद्ध ने यहाँ गुजारे थे।

महबोधि मन्दिर के पूर्वी  द्वार के सामने अजपाल निग्रोध वृक्ष है जहाँ गौतम बुद्ध पांचवा सप्ताह ध्यानरत रहे थे। इस स्थान पर उन्हें यह ज्ञान हुआ कि मानव अपने सुकर्मों से ही ब्राह्मण कहलाता है ना कि ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने मात्र से।

छठे सप्ताह गौतम बुद्ध महाबोधि मंदिर के दक्षिण में अवस्थित मचीलिंधा झील में ध्यानरत हुए। इस झील में नागराज मचीलिंधा का राज था। यह कमल से आच्छादित झील है। कहते हैं जब गौतम बुद्ध इस स्थान पर ध्यानरत थे तो जोरों की बारिश होने लग गयी। तब नागराज मचीलिंधा स्वयं आकर गौतम बुद्ध के सिर पर उसी प्रकार अपने फन फैला दिये मानो स्वयं भगवान विष्णु शेषनाग शय्या पर आसीन हों।  

सातवें और अंतिम सप्ताह में गौतम बुद्ध महाबोधि मंदिर के दक्षिण-पूर्व में स्थित राज्ययत्न वृक्ष की छा में बैठ ध्यानरत हुए। इस स्थान पर जब वे ध्यानरत थे तब बर्मा के दो व्यापारी उनके शरण में आये जो वास्तव में गौतम बुद्ध के सबसे पहले शिष्य कहे जा सकते हैं। गौतम बुद्ध ने इन्हें अपनी जटा के लट पुरस्कार स्वरूप दिये जो आज भी बर्मा के श्वेगादों पगोडा में सुरक्षित हैं।  

सात सप्ताह के गहन ध्यान चिंतन और मनन के बाद गौतम बुद्ध ने निर्णय लिया कि उन्हें उन पंचमार्गियों से मिलकर उस दिव्य-ज्ञान का उपदेश देना चाहिए जो उन्हें प्राप्त हुआ है। बोध-गया से सारनाथ की लगभग तीन सौ किलोमीटर की दूरी तय कर जब गौतम बुद्ध सारनाथ पहुंचे तो इन पंचमार्गियों ने उनका हार्दिक स्वागत किया। यहाँ इन पंचमार्गियों को उन्होनें पहला उपदेश दिया जिसे धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गयी। अपने अनुयायियों के बीच धर्मचक्र परिवर्तन का यह पहला उपदेश गौतम बुद्ध ने आषाढ़ माह की पुर्णिमा को दिया जिसे आज हम गुरु पुर्णिमा के तौर पर मनाते हैं। उन्होंने कहा कि शरीर के लिये ना तो अत्यधिक सुख और ना ही अत्यधिक कष्ट सही है। मध्यम मार्ग ही उचित, सरल और सुबोध है। गौतम बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की स्थापना की जो क्रमवार थे कि: संसार में दुख है। इन दुखों का कारण है। इन कारणों का निवारण है। निवारण आष्टांगिक मार्ग से संभव  है। आष्टांगिक मार्ग क्रमश हैं (1) सम्यक दृष्टि, (2) सम्यक संकल्प, (3) सम्यक वाचा, (4) सम्यक कर्मान्त, (5) सम्यक आजीव, (6) सम्यक व्यायाम, (7) सम्यक स्मृति, (8) सम्यक समाधि। गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायी को जीवन के दस आदेश भी दिये- (1) संहार ना करना, (2) चोरी ना करना, (3) झूठ ना बोलना, (4) बदनाम ना करना, (5) व्याभिचार ना करना, (6) धन का लोभ ना करना, (7) द्वेष ना करना, (8) दोषारोपण ना करना, (9) अज्ञानता से मुक्त होना, (10) गलत बात ना करना। 

बौद्ध धर्म आत्मा के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता। बुद्ध ने अपने अनुयायी को यह उपदेश दिया कि इस धरती पर जन्म-मृत्यु से मुक्ति के लिये हर कोई स्वयं जिम्मेवार है और वह तभी मोक्ष प्राप्त कर सकता है जब वो अपने जीवन को सही तरीके से जिए। इसके लिए आवश्यक है कि दस आदेशों और आष्टांगिक मार्ग का अनुपालन अपने जीवन में हर अनुयायी स्वेच्छा से करे।

गौतम बुद्ध की उपदेश पद्धति बड़ी सरल और सुबोध थी। साधु और गृहस्थ दोनो ही इसे समान रूप से ग्रहण कर सकते थे। गौतम बुद्ध के ये आधारभूत उपदेश थे जिन पर चलकर सामान्य से सामान्य जन भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता था। उस दौर में ये उपदेश किसी क्रांति से क़म नहीं थे और देखते ही देखते बौद्ध धर्म भारत की सीमाओं से निकल पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गया।

महाबोधि मंदिर में इन सात पावन स्थलों पर गौतम बुद्ध की उपस्थिति का अनुभव करते हुए अंततः मैं मुख्य मंदिर में प्रवेश करता हूँ। यहाँ दिव्य शांति छाई है। सामने ही कांसे में गढ़ी भूमिस्पर्श मुद्रा में गौतम बुद्ध की विशाल मूर्ति स्थापित है। यह मुद्रा उस समय कि है जब गौतम बुद्ध को दिव्य ज्ञान के प्राप्ति हुई थी। भूमि-स्पर्श मुद्रा में ध्यानस्थ गौतम बुद्ध कमल पर आसीन होते हैं। पालथी की अवस्था में इस प्रकार बैठा जाता है क़ि दोनों पैरों के तलवे ऊपर की ओर उठे होते हैं जिसे सामने से स्पष्ट देखा जा सकता है। दाहिने हाथ की उंगलियाँ धरती को स्पर्श करती है जबकि बाई हाथ की हथेली उपर की ओर खुली अवस्था में रहती हैंयह मुद्रा गौतम बुद्ध की दृढप्रतिज्ञ और स्थिर छवि को दर्शाता है 

महाबोधि मंदिर ईंट से बना सबसे पुराना मंदिर है। उत्तर से दक्षिण यह करीब 23.50 मीटर और पूरब से पश्चिम 27 मीटर में फैला है। आधार से शिखर तक की उचाई 53.30 मीटर है और मंदिर का मुख्य आधार 48 वर्ग मीटर में फैला है। पूरे मंदिर परिसर में स्तूप बिखरे पड़े हैं जिनमें से कुछ तो 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। दूसरी शताब्दी तक बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा का प्रचलन शुरू हो गया था।  तब स्तूप के एक भाग को खोल कर इसमे गौतम बुद्ध की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित की गयी। गुप्त वंश के शासन काल तक महाबोधि मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप प्राप्त कर चुकी थी। छठी शताब्दी में इस मंदिर और परिसर का वृहत पुनरुद्धार श्रीलंका के राजा मेघवर्मन द्वारा करवाया गया। किन्तु सातवीं शताब्दी में बंगाल का हिन्दू राजा शशांक ने ना केवल बोधि-वृक्ष को जड़ से उखाड़ फेंका वरन महाबोधि मंदिर को भी हिन्दू मंदिर में परिवर्तित कर दिया। बौद्ध-धर्म का भारतवर्ष से यह एक तरह से प्रतीकात्मक अंत था। बाद के वर्षों में श्रीलंका से पीपल वृक्ष के बीज लाये गये और इसे उसी स्थान पर पुनः बोया गया। श्रीलंका का यह पीपल वृक्ष मूल बोधि-वृक्ष का ही अंश था। सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संगमित्र ने महाबोधि मंदिर परिसर के मूल बोधि वृक्ष के बीज को लेकर इसे श्रीलंका में प्रतिरोपित किया था। सोलहवीं शताब्दी में गोसाई गिरि ने महाबोधि मंदिर का पुनरुद्धार करते हुए इसे भगवान शिव के मठ में परिवर्तित कर दिया। 1874 में भारतीय पुरातत्व विभाग के तत्कालिक महानिदेशक अलेक्ज़ेण्डर कनिंघम, जे.डी.एम. बेग्लार और डॉक्टर राजेन्द्र लाल मित्रा के नेतृत्व में महाबोधि मंदिर का पुनरुद्धार किया गया जो दस वर्षों बाद 1884 में पूर्ण हुआ। वर्तमान में यह मंदिर परिसर महाबोधि मंदिर एक्ट,1949, के तहत एक समिति द्वारा संचालित है। 2002 में महाबोधि मंदिर परिसर और बोधि वृक्ष को विश्व सांस्कृतिक धरोहर की मान्यता मिली।

आज का बोधगया और महाबोधि मंदिर परिसर बौद्ध-धर्म का एक दूसरा ही स्वरूप प्रस्तुत करता है। अब यह वो छोटा क़स्बा नहीं रहा जहाँ कभी राजकुमार सिद्धार्थ को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। ना ही निरंजना नदी अब कहीं अस्तित्व में है। सर्वत्र विभिन्न देशों की बौद्ध विहारों और मठों की बहुतायत है। जापान, बर्मा, श्रीलंका, चीन, मलेशिया, थाइलॅंड, कॉम्बोडिया, लाओस, बांग्लादेश भूटान आदि देश के बौद्ध विहार यहाँ देखे जा सकते हैं। इन सभी विहारों में गौतम बुद्ध की मूर्ति पूजा बौद्ध श्रद्धालु-जन को अपनी-अपनी पारंपरिक विधि से करते देखा जा सकता है। ना केवल मूर्ति पूजा वरन अन्य मामलों में भी बौद्ध-धर्म और हिन्दू-धर्म के बीच का अंतर कम हो गया है। हिन्दू-धर्म के वो आडंबर बौद्ध-धर्म में भी नज़र आते हैं जिसके विरोध में कभी इस धर्म की खोज राजकुमार सिद्धार्थ ने किया था। महाबोधि मंदिर परिसर में बौद्ध श्रद्धालु को कर्मकांड में लिप्त देखा जा सकता है जिसका मूल बौद्ध-धर्म में कोई स्थान नहीं था। मानव आज भी यदि गौतम बुद्ध के बताये सरल मार्ग पर चले तो निश्चय ही उसका उद्धार हो सकता है। अपने प्रतिपादित धर्म के इस पतन को देखकर निश्चय ही गौतम बुद्ध को, यदि वे आज होते, अफसोस होता। महाबोधि मंदिर में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष खड़ा में इसी सोच में लीन था। मेरा ध्यान यकाएक बुद्ध की प्रतिमा की ओर चला गया। मुझे महसूस हुआ मानो बुद्ध की यह प्रतिमा उदास और दुखी है- अपने अनुयायिओं के इस प्रकार दिशा से भटक जाने से । मेरी आँखें नम हो आई- गौतम बुद्ध की इस विवशता पर।  गौतम बुद्ध को नमस्कार कर में महाबोधि मंदिर से निकला और पुनः राजगीर के लिये चल पड़ा। रास्ते में वज़िरगंज है जहाँ के दसरथ माझी का बड़ा नाम है। गौतम बुद्ध ने कहा था कि अपने कर्म को ईमानदारी से करने वाला ही मोक्ष प्राप्त करता है।  मुझे लगा कि यदि किसी ने बुद्ध के इस उपदेश का अक्षरश पालन किया है तो वो दसरथ माझी ही था जिसने चट्टान के सीने को तोड़कर अपने गाँव वालों के लिये ना केवल रास्ते का निर्माण किया वरन यह भी दिखला दिया कि यदि सच्ची लगन हो तो कोई भी काम असंभव नहीं है। इस कर्मयोगी को नमस्कार कर में आगे की यात्रा पर निकल पड़ा।




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