कृष्ण और पूतना
हम
जब ईश्वर की पूजा करते हैं हम अपने आराध्य के चरण कमल में बहुत कुछ समर्पित करते
हैं। किन्तु ऐसा करते हुए हम ईश्वर के समक्ष अपना सबसे बहुमूल्य चीज़ यानि अपना
जीवन उत्सर्ग नहीं करते। पूतना को बालकृष्ण को न केवल गोद में खिलाने का सौभाग्य मिला वरन यह जानते हुए भी कि वो अपनी मौत को
बुलावा दे रही है उसे बालकृष्ण को दुग्धपान कराने का पुण्य भी प्राप्त है। बालकृष्ण
दुग्धपान करते वक़्त अपनी पलकें झपका लेते हैं। क्यों!
कुछ
विद्वानों का मत है कि श्रीकृष्ण अपनी पलकें इसलिए बंद कर लेते हैं क्योंकि उन्हें
यह ज्ञात है कि दुग्धपान करते हुए उन्हें पूतना के प्राण भी हरने हैं। अतः उन्हें
इस बात का दुख है कि इस अवतार में पहले पहल उन्हें एक महिला के प्राण हरने पड़े वो
भी तब जब वो मातृत्व के परम स्वरूप यानि दुग्धपान करा रही हो।
किन्तु
वास्तव में कृष्ण के पलकें झपकाने की यह वजह नहीं मानी जाती। सर्वदर्शी सार्वभौम
श्रीकृष्ण यह को यह पता है कि पूतना अपना जीवन उत्सर्ग करने आई है। तथापि
श्रीकृष्ण को दुग्धपान करा पूतना को अपना जीवन उत्सर्ग करने में जरा भी संकोच नहीं
है। यह बात ईश्वर के हृदय को कचोट रही है। पूतना ने तो बालकृष्ण के लिए अपने प्राण
उत्सर्ग कर दिये किन्तु बालकृष्ण ने उसे प्रतिदान स्वरूप क्या दिया। इसी संकोच से
श्रीकृष्ण के पलकें झपकी हुई हैं। भगवान को अपनी गोद में खिलाने और उन्हें
दुग्धपान कराने के पुण्यस्वरूप श्रीनारायण उसे मोक्ष प्रदान करते हैं। यह ईश्वर का
अपने भक्तों के प्रति दया-भाव का अप्रतिम उदाहरण है। इस प्रसंग का वर्णन
वेंकटाद्रि कवि ने अपनी कृति ‘लक्ष्मी
सहस्त्र में बड़े करुणा भाव से किया है।
| श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा |
| श्री कृष्ण जन्मस्थान मुख्य द्वार |
| नंदकिला अवस्थित पूतना मोक्ष कक्ष |
| इस्कॉन मंदिर में श्री राधाकृष्ण की मनोरम छवि |
| बाँके बिहारी मंदिर, वृन्दावन |
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